केन्द्र ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का व्यक्ति होने से उन पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि उन्हें संवैधानिक पद पर निर्वाचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि संविधान में अधिग्रहीत या प्राकृतिक नागरिकता के बीच कोई भेद नहीं है।
केन्द्र ने कहा कि नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों के तहत भारत की नागरिकता एक बार हासिल कर लेने पर संबंधित व्यक्ति संविधान के उद्देश्य से नागरिक बन जाता है और ऐसे व्यक्ति पर संवैधानिक पद पर निर्वाचन के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है। केन्द्र का यह नजरिया उस याचिका के जवाब में सामने आया, जिसे राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने दायर किया था। इस संगठन ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का व्यक्ति होने का मुद्दा तब उठाया था, जब अविश्वास प्रस्ताव के कारण राजग सरकार के गिर जाने के बाद कांगेस अध्यक्ष को तत्कालीन राष्ट्रपति ने 1999 में सरकार के गठन के लिए आमंत्रित किया था।
उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र से यह जवाब माँगा था कि क्या पंजीकरण के बाद भारतीय नागरिकता हासिल करने वाला व्यक्ति संवैधानिक पद हासिल कर सकता है। केन्द्र ने एक सवाल के जवाब में कहा था संविधान नागरिकों के बीच भेद नहीं करता और नागरिकों की एकल श्रेणी में कोई विभाजन नहीं किया गया है। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अनुच्छेद 5 में वर्णित प्राकृतिक रूप से जन्मजात नागरिकों को अन्य तरीकों से नागरिकता पाए लोगों से उच्चतर माना जाता है।
केन्द्र ने कहा कि नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक बार नागरिकता हासिल हो जाने के बाद नागरिकों में संविधान या नागरिकता अधिनियम के तहत किसी भी प्रकार का भेद नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का तर्क था कि किसी राजनीतिक दल का नेतृत्व ऐसा व्यक्ति नहीं कर सकता, जिसने पंजीकरण के माध्यम से भारत की नागरिकता ग्रहण की हो।