कांग्रेसी टिकट पर लोकसभा पहुंचे उत्तर प्रदेश के नेता बेनी प्रसाद वर्मा की अटल पर एक विवादित टिप्पणी से सदन में हंगामा हो गया। बेनी की टिप्पणी पर गृह मंत्री की तरफ से क्षमा मांगे जाने के बावजूद सदन दो बार स्थगित हुआ और गृह मंत्री का जवाब भी भाजपा सदस्यों की अनवरत नारेबाजी के बीच संपन्न हुआ। लिब्रहान रिपोर्ट पर बहस के पहले दिन, सरकार ने रिपोर्ट में अटल का नाम आने को लेकर खेद जाहिर किया था। लेकिन जब बेनी बोलने खड़े हुए तो उन्होंने लिब्रहान आयोग द्वारा अटल और आडवाणी के लिए इस्तेमाल किए गए 'लिटिल मैन' शब्द को जायज ठहराते हुए इसकी पहले हिन्दी और फिर भोजपुरी में व्याख्या कर डाली। शब्द असंसदीय थे, इसलिए हंगामा होना था। अध्यक्ष मीरा कुमार ने बेनी के शब्द कार्यवाही से निकाले। चिदंबरम ने क्षमा मांगी, लेकिन हंगामा नहीं थमा और पांच बजे के करीब सदन स्थगित हो गया। स्थगन के बाद जदयू नेता शरद यादव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने भी बेनी की टिप्पणी को असंसदीय और अनुचित ठहराया। उन्होंने बेनी को माफी मांगने की सलाह दी। खुद मीरा कुमार ने भी इसे दुखद कहा, लेकिन बेनी ने माफी नहीं मांगी। सिर्फ खेद जाहिर किया। भाजपा के नेता बेनी से माफी मंगवाने पर अड़ गए और सदन की कार्यवाही फिर स्थगित हो गई। सदन दोबारा शुरू होने पर सत्ता पक्ष ने बेनी को सदन से बाहर भेज दिया। मगर हंगामा नहीं थमा और चिदंबरम का जवाब शोर शराबे के बीच हुआ।सिर्फ यही नहीं, अटल का जिक्र सुषमा स्वराज के संबोधन में भी आया। सुषमा ने अटल का नाम षड्यंत्रकारियों की सूची में होने को लेकर सरकार की सफाई का स्वागत किया, लेकिन कहा कि आयोग की नजर में भाजपा के दिग्गज अटल-आडवाणी किसी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर की तरह अयोध्या में ढांचा ध्वंस के लिए जिम्मेदार थे। तो फिर सत्ता में बतौर मैनेजिंग डायरेक्टर बैठे नरसिंह राव और कांग्रेस के बाकी लोग कैसे निर्दोष हो सकते हैं। इसमें सुषमा ने राव सरकार के वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को भी लपेटा। हालांकि इस पर सत्ता पक्ष की तरफ से कोई खास प्रतिवाद नहंी हुआ।
इस बीच भाजपा अपने एजेंडे पर है, मगर कुछ सतर्कता के साथ। सुषमा पूरी मुस्तैदी के साथ अपने एजेंडे पर थीं। उन्हें लिब्रहान की रिपोर्ट को खारिज करना और सरकार को कठघरे में खड़ा करना था। रिपोर्ट की खामियों ने उन्हें ऐसा करने का पूरा मौका दिया और सत्ता पक्ष को रक्षात्मक रखने के लिए उनके पास बहुत कुछ था। उन्होंने विकृत, पूर्वाग्रह पूर्ण और अवसरवादी राजनीति से प्रेरित कहते हुए रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया और आगाह किया कि यह रिपोर्ट सांप्रदायिक तनाव बढ़ा सकती है। सुषमा केसवालों पर कांग्रेस की चुप्पी और गृह मंत्री पी. चिदंबरम की मुद्रा यह बता रही थी कि सुषमा के तीर निशाने पर थे। सुषमा ने कहा कि सीबीआई, खुफिया विभाग और मुस्लिम संगठनों ने ढांचा ध्वंस के खिलाफ शिकायत की थी। मगर वे ऐसा कोई तथ्य पेश नहीं कर सके जिससे यह साबित हो कि ढांचा साजिशन ढहाया गया। यह बात आयोग ने भी मानी है। मुस्लिम संगठन तो बगैर कोई सुबूत दिए अलग हो गए। सुषमा ने कहा कि लिब्रहान रिपोर्ट तथ्यात्मक भूलों से भरी है। इसमें न केवल उन लोगों के नाम हैं जो वहां थे ही नहीं, बल्कि गलत संदर्भ व उद्धरण भी दिए गए हैं। उन्होंने जिन्ना की एक टिप्पणी को दीनदयाल उपाध्याय के नाम उद्धृत किए जाने का जिक्र भी किया। सुषमा ने कहा कि यह रिपोर्ट राजनीतिक अवसरवाद से प्रेरित है और उन्हें शक है कि रिपोर्ट लिब्रहान ने नहंी, बल्कि किसी और ने लिखी है। सुषमा यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने कहा कि लिब्रहान ने मुस्लिम समुदाय को हिंदू समुदाय के आमने-सामने खड़े होने के लिए उकसाया है। रिपोर्ट में लिब्रहान ने कहा है कि जब हिंदू संगठन खड़े थे तो मुस्लिम आवाम सोई हुई थी। सुषमा ने कहा कि यह रिपोर्ट सांप्रदायिक दुर्भावना का दस्तावेज है और दंगा भड़का सकता है। लिहाजा इसे तत्काल खारिज कर देना चाहिए। सुषमा ने कहा कि राम मंदिर निर्माण एक आंदोलन था। कारसेवकों में भावनाएं हिलोरें मार रही थीं। उन्होंने ढांचा गिरा दिया। इसके लिए अगर सरकार सजा देना चाहती है तो पूरी भाजपा दंड भुगतने को तैयार है। लेकिन साथ ही यह मांग भी है कि विसंगतियों से भरी लिब्रहान रिपोर्ट को खारिज किया जाए।