
ओबामा की नई अफगान-नीति में नया क्या है? उसमें ऐसा क्या है, जिसके कारण उसे बुश से अलग कहा जा सके? सिर्फ एक बात अलग है। वह यह कि अब से 18 माह बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी शुरू हो जाएगी। वापसी की बात कभी बुश के दिमाग में आई ही नहीं। शायद इतनी दूर की बात सोचने की क्षमता बुश में थी ही नहीं। ओबामा बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने यह घोषणा की। वास्तव में वह अवधि व्यावहारिक रूप में एक साल की ही होगी, क्योंकि 30 हजार नए फौजियों को अफगानिस्तान पहुंचते-पहुंचते छह माह लग जाएंगे। दूसरे शब्दों में अमेरिका के लगभग एक लाख जवानों और नाटों के लगभग 50 हजार जवानों को एक साल की मोहलत मिली है कि वे इस युद्घ को जीत कर दिखाएं।ओबामा के प्रतिद्वंद्वी मैकेन ने घोषणा को गलत कहा है। उनका तर्क है कि इसकी वजह से अफगान सरकार, फौज और जनता का मनोबल भी गिरेगा। तालिबान डेढ़ साल तक चुप बैठ जाएंगे और वापसी शुरू होते ही अफगान सरकार पर टूट पड़ेंगे। उनके ये तर्क बिल्कुल गलत हैं। वापसी की घोषणा का सबसे पहला असर अफगानिस्तान की जनता पर यह होगा कि अमेरिका की छवि सुधरेगी। यह धारणा निर्मूल होगी कि अमेरिका अफगानिस्तान को अनंत काल तक कब्जाए रहेगा। वे अब जानेंगे कि अमेरिका जिस सीमित उद्देश्य के लिए अफगानिस्तान में आया था, उसके पूरे होते ही वापस चला जाएगा। यों भी आम अफगानों के मन में पश्चिमी फौजों (इसाफ) के लिए सराहना का वह भाव अब नहीं है, जो 2001 में था।दूसरा, पश्चिमी फौजों की उपस्थिति ही तालिबान की वापसी का सबसे बड़ा कारण है। तालिबान बड़ी तरकीब से काम ले रहे हैं। वे अफगानों को समझा रहे हैं कि ब्रिटिश और सोवियत फौजों की तरह अमेरिकी फौजों ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है और काबुल में उन्होंने कठपुतली सरकार बिठा रखी है। यह लड़ाई सिर्फ इस्लामी जिहाद की ही नहीं है, अफगानिस्तान की आजादी की भी है। अब ओबामा की घोषणा से यह तर्क अपने आप गल जाएगा।तीसरा, वापसी की घोषणा अफगान सरकार को अपनी कमर कसने पर मजबूर करेगी। ओबामा ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि अब ‘ब्लैंक चेक’ का ज़माना लद गया है यानी ‘करो या मरो’। यदि अगले एक-डेढ़ साल में अफगान सरकार अपने पांव पर खड़ी नहीं हो सकी तो उसे हटना पड़ेगा। इस चुनौती के कारण उसे कठोर निर्णय लेने ही पड़ेंगे। चौथा, पश्चिमी सेनाओं को अब किसी भी बहानेबाजी का मौका नहीं मिलेगा। उन्हें पता चल गया है कि अब एक-डेढ़ साल में उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करना है। पांचवा, इससे आम अमेरिकी को काफी सांत्वना मिल रही है। उन्हें इराक और अफगानिस्तान की अंधी सुरंगों के पार अब आशा की किरण दिखाई पड़ने लगी है।






