भारत के लिये कूटनीटिक समस्यायें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर के विषय को उठाने के बाद और इसे एक स्वतन्त्र देश का दर्जा देने की माँग उठाने के बाद विश्व के मुस्लिम देशों के संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कांफ्रेंस ने जम्मू कश्मीर के लिये विशेष राजदूत की नियुक्ति कर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत की मुश्किलें और बढा दी हैं। ओआईसी के इस निर्णय का भारत की स्थिति पर दूरगामी प्रभाव पड्ने वाला है। इससे एक ओर तो पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले देश के रूप में विश्व भर में बन रही अपनी पहचान से लोगों का ध्यान हटाकर कश्मीर के विषय को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का बना सकेगा और इसी के साथ कश्मीर में कार्यरत अलगाववादी संगठन नयी परिस्थितियों में कश्मीर के मुद्दे को पुनर्परिभाषित कर सकेंगे। पिछले कुछ दिनों से भारत सरकार और कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के मध्य नये सिरे से बातचीत के लिये प्रयास हो रहे हैं और अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस माह के अंतिम सप्ताह में इन दोनों पक्षों में बातचीत का दौर आरम्भ हो सकता है। कश्मीर के विषय पर भारत सरकार हुर्रियत के साथ जो बातचीत करना चाहती है उसके पीछे एक तो अमेरिका का दबाव काम कर रहा है तो वहीं पिछले दिनों पाकिस्तान की सरकार द्वारा गिलगित और बालटिस्तान के क्षेत्र को एक अध्यादेश द्वारा स्वायत्तता देने के बाद भी उसे प्रकारांतर से पाकिस्तान के अधीन कर लेने से भी स्थितियों में कुछ परिवर्तन आया है। गिलगित और बालटिस्तान क्षेत्र जम्मू कश्मीर का अंग नहीं था वरन जम्मू कश्मीर का उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। भारत पाकिस्तान के विभाजन के उपरांत 1 नवम्बर 1948 को यह क्षेत्र् डोगरा राज्य से अलग हो गया और पाकिस्तान में विलय कर लिया परंतु पाकिस्तान ने इसे पाक अधिकृत कश्मीर का अंग नहीं बनाया और एक विशेष कानून के द्वारा इसे प्रशासित किया। इस पर लागू होने वाला कानून अंग्रेजों के समय का ही कानून था जिसने अंतर्गत इस क्षेत्र के लोगों को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं दी गयी और ये लोग लगभग मार्शल ला की स्थिति में जीने को विवश रहे। पाक अधिकृत कश्मीर ने से अपने क्षेत्र का अंग बनाने से मना कर दिया क्योंकि इसके निवासी शिया और इस्मायली थे और पाक अधिकृत कश्मीर के शासकों का आशंका थी कि इस क्षेत्र के आने से उनका सुन्नी प्रभाव क्षीण हो जायेगा।
1980 के दशक में इस क्षेत्र में जनरल जिया उल हक ने शिया और इस्मायली लोगों का दमन कर यहाँ सुन्नी प्रभाव बढाने का प्रयास किया जिसके चलते इस क्षेत्र में भी शिया सुन्नी संघर्ष हुआ जिससे कि इस दशक में पूरा पाकिस्तान प्रभावित था और खुफिया एजेंसियों का तो कहना है कि जनरल जिया उल हक के विमान की दुर्घटना में इसी क्षेत्र के शिया तत्वों का हाथ था क्योंकि उस समय तक विमान के लिये तकनीकी और सेवाकर्मियों के लिये इसी क्षेत्र के शिया लोगों की भर्ती की जाती थी। इस घटना के बाद से पाकिस्तान के शासक वर्ग ने गिलगित और बालटिस्तान में कडे कानून और सेंसरशिप के जरिये इस क्षेत्र में किसी राजनीतिक आन्दोलन या यहाँ की सूचनायें बाहर नहीं जाने देने का पूरा प्रयास किया। इसके साथ ही यह पहाडी क्षेत्र पाकिस्तान के लिये रणनीतिक दृष्टि से भी काफी लाभदायक था और कराकोरम पहाडी क्षेत्र इसी क्षेत्र में होने के कारण 1980 के दशक में पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान ने इसी पहाडी क्षेत्र का उपयोग कर चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ परमाणु तकनीक का आदान प्रदान किया। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरुद्ध पाकिस्तान का उपयोग करते हुए अमेरिका ने पाकिस्तान की परमाणु तस्करी की ओर से आंखें मूँदें रखीं और अमेरिकी कांग्रेस प्रति वर्ष उसे परमाणु के सम्बन्ध में चरित्र प्रमाण पत्र देती रही। इसी के साथ गिलगित और बाल्टिस्तान में जो दमन चक्र चलाया गया उस ओर से भी शेष विश्व ने आँख मूँद ली। 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद बदली हुए परिस्थितियों में विशेषकर अब्दुल कदीर खान के परमाणु तस्करी के नेटवर्क के खुलासे के बाद इस्लामी आतंकवादियों के हाथ में परमाणु तकनीक चले जाने के भय से अमेरिका और इजरायल सहित पश्चिमी देशों के पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर नजर रखे जाने से कराकोरम पहाडी क्षेत्र का रणनीतिक मह्त्व बढ गया और साथ ही पिछले अनेक दशक से गिलगित और बालटिस्तान में राजनीतिक और व्यक्तिगत अधिकारों के लिये चल रहे संघर्ष को कुछ हद तक शांत करने के लिये पाकिस्तान ने अब इस क्षेत्र को स्वायत्तता देने का नाटक रचा है जबकि इस बहाने इस क्षेत्र को पाकिस्तान के नियंत्रण में ले लिया गया है। इस क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान में अनेक मत हैं और अनेक बार पाक अधिकृत कश्मीर के न्यायालय और पाकिस्तान के न्यायालय में टकराव हो चुका है कि इस क्षेत्र को विवादित माना जाये या फिर पाक अधिकृत कश्मीर का अंग माना जाये। कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दा मान लिया गया है। क्योंकि 1 नवम्बर 1948 को पाकिस्तान में विलय के समय भी पाकिस्तान ने इसे अपना अंग नहीं बनाया था और इसे विवादित क्षेत्र ही माना था जिसके भाग्य का फैसला भविष्य़ में कश्मीर की स्थिति पर निर्भर करेगा।
ऐसी परिस्थिति में एक तो यह क्षेत्र पूरी तरह स्वायत्त है और 15 अगस्त 1947 से पूर्व की स्थिति के अनुसार इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का कोई अधिकार नहीं बनता है। लेकिन इस पूरे मामले में भारत सरकार की ओर से जो भी ढीली ढाली प्रतिक्रिया आयी है उससे तो यही लगता है कि देश की संसद ने 1994 में जो प्रस्ताव पारित किया था कि पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेंगे उसके प्रति अब सरकार गम्भीर नहीं है और पाक अधिकृत कश्मीर तो दूर एक अन्य विवादित क्षेत्र के पाकिस्तान का अंग बना लेने पर भी भारत सरकार ने मुखर होकर इसका विरोध नहीं किया। कश्मीर के मुद्दे को छोडकर गिलगित और बालटिस्तान का पहाडी क्षेत्र और कराकोरम का क्षेत्र रणनीतिक स्थिति से अत्यंत संवेदनशील है ऐसे में चीन की इस क्षेत्र में बढती भूमिका को देखते हुए भी इस क्षेत्र पर पाकिस्तान की प्रशासनिक पकड निश्चित रूप से भारत के लिये चिंता का कारण होना चाहिये परंतु भारत सरकार ने इस विषय को जनता से बचाने का ही प्रयास अधिक किया और मीडिया ने भी इस विषय को अधिक मह्त्व देना उचित नहीं समझा। 1980 के दशक की भाँति एक बार फिर अफगानिस्तान में अमेरिका को पाकिस्तान की आवश्यकता है साथ ही उसके पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में स्थित अल कायदा और तालिबान के लडाकों और नेतृत्व को समाप्त करने के लिये भी वह पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर है। अमेरिका की इस लाचारी का लाभ उठाकर पाकिस्तान उसे अपने हित में उसी प्रकार प्रयोग कर रहा है जैसे 1980 के दशक में किया था।अमेरिका के राष्ट्रपति और उनका प्रशासन भी पाकिस्तान के इस तर्क से सहमत हुआ सा लगता है कि यदि भारत से लगी सीमा पर शांति रहे तो पाकिस्तान को आतंकवाद से लड्ने में अधिक सहायता होगी। इस तर्क के सहारे पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दबाव डाल रहा है और बडी चालाकी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे इस्लामिक राजनीति से जोड रहा है।
भारत सरकार ने एक बार फिर हुर्रियत कांफ्रेस के साथ बातचीत का जो निर्णय लिया है उसके सकारात्मक परिणाम मिलने की सम्भावना अत्यंत क्षीण है क्योंकि हुर्रियत कांफ्रेंस एक ओर तो पाकिस्तान के नेताओं के निकट सम्पर्क में है और ओआईसी जैसे संगठनों के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे को वैश्विक इस्लामी राजनीतिक के साथ जोड रहा है और दूसरी ओर इसी आक्रामक कूट्नीति के सहारे भारत को बातचीत के लिये विवश कर रहा है। ऐसे में पिछले दो दशक से चल रहे इस्लामी आतंकवाद और अलगाववादी आन्दोलन को नया आयाम प्राप्त हो जायेगा और इन तत्वों को लगेगा कि आतंकवाद के बल पर सरकारों को कूटनीतिक मेज पर घसीटा जा सकता है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार आतंकवाद की परिभाषा उभर कर आयी थी और विश्व समुदाय में आतंकवाद की पुरानी अवधारणा कि एक के लिये आतंकवादी दूसरे के लिये स्वतंत्रता का संघर्ष करने वाला है ध्वस्त हो गयी थी और कश्मीर से लेकर चेचन्या तक सभी को आत्ंकवादी ही माना जाने लगा था। यह स्थिति अब बदल रही है। जो लोग जार्ज बुश की पराजय और बराक ओबामा की विजय से नये विश्व का उदय देख रहे हैं उन्हें ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद कश्मीर की स्थिति में आये बदलाव की ओर भी ध्यान देना चाहिये। कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की सरकार के गठन के साथ ही जम्मू कश्मीर में एक विशेष प्रकार की राजनीति के दर्शन हमें हो रहे हैं। जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने एक नरम अलगाववाद की नीति अपनाकर हुर्रियत कांफ्रेस और पीडीपी का राजनीतिक विस्तार समाप्त करने का प्रयास किया लेकिन इस सरकार के गठन के बाद से ही पीडीपी और हुर्रियत कांफ्रेंस ने किसी न किसी विषय को लेकर रोज कश्मीर की सडकों पर प्रदर्शन और हिंसा को आम कर दिया है ताकि विश्व समुदाय को यह सन्देश दिया जा सके कि कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन चरम पर है और इस क्षेत्र के लोग स्वतंत्रता चाहते हैं। इसी स्थिति के मध्य पाकिस्तान की ओर से सीमा पार घुसपैठ की घटनायें तेज हो गयी हैं और रोज सैन्य बलों के साथ पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों की मुठभेड के समाचार आते हैं लेकिन सामान्य जनता को इससे कोई फर्क नहीं पडता क्योंकि उन्हें अब इस क्षेत्र के प्रति कोई संवेदना नहीं रही और उन्हें पता है कि यहाँ रोज ऐसी घटनायें होती रहती हैं। देश के लोगों की यही संवेदनहीनता भारत सरकार को कश्मीर के मामले पर ढुलमुल् रवैया अपनाने का साहस प्रदान करती है।
पिछले अनेक अवसरों पर हम देख चुके हैं कि हुर्रियत और सरकार के मध्य बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है सिवाय इसके कि हुर्रियत जैसे पाकिस्तान परस्त अलगाववादी संगठन को मान्यता देकर भारत सरकार प्रकारांतर से पाकिस्तान को भी कश्मीर की समस्या का अंग बना लेती है। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि बातचीत नहीं तो इस समस्या का निदान क्या है? निश्चित रूप से बातचीत होनी चाहिये लेकिन देश को यह तो पता होना चाहिये कि आखिर सरकार इस बातचीत से हासिल क्या करना चाहती है? केवल किसी के कहने पर या दबाव में बातचीत का अर्थ ही क्या हुआ? क्या बातचीत के द्वारा हुर्रियत के इस तर्क को स्वीकार किया जायेगा कि आतंकवाद के आरोप में जेलों में बन्द लोग राजनीतिक कैदी हैं , या फिर कश्मीर से सेना हटाने के प्रस्ताव को माना जायेगा? जितनी बार भी हुर्रियत जैसे संगठ्नों के साथ बातचीत का प्रस्ताव किया जाता है निश्चित रूप से उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को सन्देश जाता है कि लगातार आतंकवाद की नीति का परिणाम होता है और आतंकवाद से लड्ते लड्ते अंततः राज्य, सरकार और जनता बातचीत की मेज पर आ ही जाती है और ऐसे थके और हारे लोगों के साथ मनमानी शर्तों पर बातचीत की जा सकती है।ऐसी स्थिति में जबकि भारत में पिछले वर्ष 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए इस्लामी आतंकवादी आक्रमण के बाद आज दस महीने व्यतीत हो जाने पर भी भारत सरकार पाकिस्तान को कुछ भी करने के लिये बाध्य नहीं कर पाई जबकि इसके विपरीत पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक माध्यमों से उठवाने में सफल रहा और अब भारत ने पाकिस्तान परस्त कश्मीरी अलगाववादी संगठन के साथ बातचीत के प्रस्ताव को मानकर अपनी कूटनीतिक विवशता का परिचय दे दिया है। आज की स्थिति में पाकिस्तान भारत के लिये एजेंडा बना रहा है और भारत उसका पालन करने के लिये विवश है। 110 करोड की जनसंख्या वाला, परमाणु सम्पन्न देश जो महाशक्ति बनने का स्वप्न देख रहा है उसकी यह विवशता देखकर कष्ट आश्चर्यजनक है क्योंकि यह विवशता इस देश के लोगों की नहीं है वरन इस देश के राजनीतिक नेतृत्व की है। यह विवशता तो तब और उजागर होती है जब हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ यदि शांति प्रक्रिया नहीं चली तो उसका अर्थ होगा युद्ध लेकिन शायद प्रधानमंत्री जी भूल जाते हैं कि पाकिस्तान तो भारत के साथ पिछले 62 वर्षों से नित्य प्रति प्रच्छ्न्न युद्ध लड रहा है और हम नये नये तर्कों के सहारे अपनी विवशता, लाचारी और कमजोरी को छिपा रहे हैं।
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