नपुंसक भी अपने ऊपर हुए हमले को नहीं भूल पाता। जख्म ताजे रहते हैं, आघात पर प्रतिघात की कसमसाहट बनी ही रहती है। 26 नवंबर स्वतंत्र भारत के इतिहास की ऐसी ही तारीख है। आज से ठीक एक साल पहले पाकिस्तान प्रायोजित जिहादी आतंकवाद ने मुंबई में अपने ढंग का सबसे बड़ा रक्तपात किया था। दुनिया का सबसे बड़ा जनतांत्रिक राष्ट्र-राज्य ठहर गया था, खुफिया तंत्र फेल था, दिल्ली दुबक गई थी। युद्ध सीमा पर नहीं, घर के भीतर था। राष्ट्र असहाय था। 60 घंटे तक रात-दिन युद्ध चला। मुंबई एटीएस के अनेक जांबाज अधिकारी शहीद हुए। 175 लोग मारे गए, 249 घायल हुए। घाव देश के प्रत्येक नागरिक के भी सीने में लगे। भारत बेइज्जत हुआ। राष्ट्र इस अपमान को भुला नहीं सकता। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वाशिंगटन में खुलासा किया है कि 26/11 के बाद उन पर पाकिस्तान को सैनिक जवाब देने का चौतरफा दबाव था, लेकिन उन्होंने संयम बरता। क्यों बरता? क्या यह उनका व्यक्तिगत निर्णय था? या उसी देश का आदेश था जहां उन्होंने यह खुलासा किया है? उन्होंने आतंकियों पर कार्रवाई के लिए पाक पर दबाव बनाने का काम सारी दुनिया पर छोड़ दिया है। 26 नवंबर की तुलना अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितंबर को हुए हमले से की जाती है। बेशक दोनों जिहादी हमले हैं, दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व और राजनीतिक तंत्र में बुनियादी फर्क है। 12 सितंबर के बाद का अमेरिका राष्ट्रीय अपमान से दग्ध और राष्ट्रीय स्वाभिमान से लैस आक्रामक राष्ट्र है। वह सहमा राष्ट्र नहीं रहा, वह शत्रुओं पर लगातार हमलावर है। ड्रोन विमानों से गिरते हरेक बम में भविष्य के सुरक्षित अमेरिका की गारंटी है। अमेरिका ने आतंकवाद से लड़ने का सबसे सख्त कानून बनाया। अमेरिकी खुफियातंत्र की नजर विश्व के हरेक चप्पे पर है। भारत ने क्या किया? मुंबई हमले के बाद सारा देश सरकार के साथ था। मुख्य प्रतिपक्षी दल भाजपा भी साथ थी। मुंबई हमले के बाद करो या मरो जैसे विकल्पहीन हालत थे। प्रधानमंत्री ने संयम क्यों बरता? कड़ा कानून बनाने में क्या दिक्कतें थीं? आखिरकार पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने से किसने रोका? मुंबई हमले के बाद भी पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष ने ललकारा था, राष्ट्र के रक्त में उबाल था। बुनियादी सवाल यह है कि 9/11 के बाद जो कुछ अमेरिका ने किया वही सब कुछ भारत ने भी क्यों नहीं किया? तब प्रधानमंत्री ने 100 दिन मांगे थे। सरकार के सामने लोकसभा चुनाव की प्राथमिकता थी। तुष्टीकरण के एजेंडे में चलना जरूरी था। प्रधानमंत्री अब दूसरी पारी में हैं, अब भी वे अमेरिका से ही पाकिस्तान पर दबाव डालने की ही नीति पर क्यों कायम हैं? पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियां जारी हैं। केंद्र जब-तब संभावित आतंकी हमलों से देश को सतर्क करता रहता है। केंद्र ने आखिरकार 26/11 के हमले से क्या सीखा है? क्या उसने अपना खुफिया तंत्र मजबूत कर लिया है? दाऊद गिलानी उर्फ डेविड हेडली इस हमले के पहले कई दफा भारत आया। मुंबई घूमा। उसने यहां अपने संपर्क भी तलाश लिए। हेडली की कारस्तानी भी अमेरिकी खुफिया तंत्र की जुबानी ही भारत को पता चली। भारत आंतरिक सुरक्षा और वाह्य आक्रमणों से देश की सुरक्षा के बारे में भी जरूरी सूचना तंत्र के लिए अमेरिका पर निर्भर है। भारत को लगातार आगामी हमलों की तैयारी की सूचनाएं मिल रही हैं। भारत के पास पाकिस्तान में चल रहे आतंकी ट्रेनिंग कैंपों की जानकारी है। प्रधानमंत्री ने 26/11 के बाद सैनिक कार्रवाई से संयम बरता, लेकिन आगे फिर से ऐसा ही हमला हुआ तो सरकार क्या करेगी? प्रधानमंत्री ने फौरी कार्रवाई की कोई चेतावनी वाशिंगटन में भी नहीं दी। भारत पाकिस्तान को अंतिम चेतावनी क्यों नहीं देता? जिहादी आतंकवाद विश्वव्यापी है।
अमेरिका 9/11 के बाद से आक्रामक है। ब्रिटेन ने आतंकी हमलों से सबक लिया है। आस्ट्रेलिया, फिलीपींस, थाईलैंड, रूस, मिस्त्र, यूगोस्लाविया सहित अनेक भूराजनैतिक क्षेत्र पीडि़त हैं। पाकिस्तान जिहादी आतंक की नर्सरी है। जिहादी आतंकी उसी की नाजायज औलाद है। अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा सहित अन्य तमाम आतंकी समूह भारत को नेस्तनाबूद करने पर आमादा हैं। भारत का समूचा पड़ोस खदबदा रहा है। म्यांमार में फौजी शासन है। नेपाल से अच्छे संबंध नहीं हैं। अफगानिस्तानी सरकार एक प्रकार से अमेरिकी फ्रेंचाइजी है। चीन के तेवर चिंताजनक हैं। पाकिस्तान की असली सत्ता फौज के हाथ में है। पाक प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति से हुई बातचीत का कोई मतलब नहीं होता। आईएसआई और पाकिस्तानी सेना भारत विरोधी आतंकियों की संरक्षक, प्रशिक्षक और निर्यातकत्र्ता है। भारत की जिहादी हिंसा धारावाहिक है। अयोध्या, अक्षरधाम, रघुनाथ मंदिर, संकट मोचन, रामपुर छावनी, संसद, दिल्ली, असम, यूपी, गुजरात और अक्सर जम्मू कश्मीर। 26/11 का मुंबई हमला ताजा जिहादी आतंकी कृत्य है। आक्रमण से बड़ी कोई सुरक्षा नीति नहीं होती। यह निरर्थक बात है कि वे हमारे देश में घुसें। पहले वे गोली चलाएं, तब हम आत्म रक्षार्थ हथियार उठाएं। भारतीय राजनेता याददाश्त में कच्चे हैं या जानबूझकर भूल जाने के उद्यमी हैं। डा. अम्बेडकर में गजब का इतिहास बोध था। उन्होंने लिखा कि ह्ववेनसांग की यात्रा के समय पंजाब, अफगानिस्तान भारतीय भूभाग था। मो. बिन कासिम ने सिंध पर हमला (711) किया। इसके बाद 1001 और बाद में गजनी ने 17 बार और 1173 में गोरी ने हमला किया। चंगेजखान ने 1221 में, बाबर ने 1526 में, नादिर शाह ने 1738 में और 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने हमला किया। इस्लाम की स्थापना इन हमलों का उद्देश्य था। बाद के पाकिस्तानी और उसके बाद के जिहादी आतंकी हमलों का लंबा इतिहास है, लेकिन मकसद एक है-भारत की संप्रभुता और संस्कृति का नाश। जिहादी आतंकवाद एक सुनिश्चित विचारधारा है। यह बच्चों, स्ति्रयों और गरीबों को आत्मघाती मानव बम बनाती है और निर्दोष बच्चों, महिलाओं, बीमारों, विकलांगों को भी मारने के जघन्य कर्म को भी जायज ठहराती है। 26 नवंबर मुंबई हमले की बरसी है। भारत एक साल बाद कहां खड़ा है? भारत में समय ठहर गया है। क्या वाशिंगटन के सामने प्रार्थी और याचक भाव की भूमिका ही भारत की नियति है? मुंबई बेशक त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरे में है। महाराष्ट्र ने एनएसजी की शैली पर एक नया आक्रामक पुलिस बल बनाया है, लेकिन शेष भारत का क्या होगा? जिहादी आतंकवाद के निशाने पर पूरा भारत है। भारत में उनके सहयोगी हैं। कानून एवं व्यवस्था और पुलिस राज्यों का विषय है, लेकिन पाकिस्तानी जिहादी हमले कानून एवं व्यवस्था के सामान्य विषय नहीं हैं। ये प्रत्यक्ष युद्ध हैं और युद्ध से सुरक्षा करना तथा युद्ध घोषित करना केंद्र की ही संवैधानिक जिम्मेदारी है। अजमल कसाब की सुनवाई लंबी खिंची है। पाकिस्तान में बैठे हफीज मोहम्मद, जकीउर रहमान, जफरशाह व कर्नल आर. सैदतुल्ला जैसे मुख्य अभियुक्त व रणनीतिकार मजे में हैं। पाकिस्तान से कोई भी उम्मीद बेकार है। प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा है कि पाकिस्तान मुंबई हमलों के गुनहगारों को सजा दिलाने की कोशिश नहीं कर रहा है। सवाल यह है कि तब भारत की अपनी तैयारी क्या है? भारत अपने दम पर जिहादी आतंकवाद से क्यों नहीं लड़ता? आखिर बार-बार मार खाकर भी भारत प्रतिकार क्यों नहीं करता? (लेखक उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं)
सौजन्य दैनिक जागरण
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