डॉ. रिचर्ड बेंकिनअमेरिकी पत्रकार
जिन आतंकवादियो ने मुम्बई पर हमला किया, जो इसकी साजिश में शामिल हुए, जिन्होने इसमे पैसा लगाया सभी पापी और दुष्ट आत्मा थे। सभी मानव के रुप मे दानव थे। जो लोग रुढिवादी इस्लामिक विचार धारा के बारे मे गहराई से जानते है वे इस घटना से तनिक भी विचलित नही हुए। इस से पहले भी ये इस तरह के कारवाई करके अपनी योग्यता का परिचय दे चुके थे।
11 सितम्बर 2001 को यही रुढिवादी इस्लामिक आतंकवादी ने बम विस्फोट के द्वारा 3000 अमेरिकियो को मारा था। तब से लेकर अबतक इन लोगो ने 11,000 हजार से ज्यायदा आतंकवादी हमले किये है। यह पहली बार नही हुआ है कि इन लोगो ने आत्मघाती दस्ते, हवाईजहाज का अपहरण के अपने कार्यो को सम्पादित किया हो। रुढिवादी इस्लामिक आतंकवादी हमलो के लिए दोनो तरह के शस्त्रो और अस्त्रो का प्रयोग करते आये है। इन लोगो ने स्कुलो को उडा के और बसो का अपहरण करके विश्व के दो दर्जन देशो मे आतंकवादी हमलो को अंजाम दिया है। इनके नेता सार्वजनिक रुप से हिन्दुओ और यहुदियो को खत्म करने की वात करते है। इन नेताओ का अनुसरण करने वाले खुलेआम ऐसी घटनाओ का अंजाम देते है।ये जहा पर भी शक्तिशाली होकर सत्ता मे आते है धार्मिक आस्थाओ की जगहो को ध्वस्त करते है। इसलिए जब इन लोगो ने मुम्बई के दस जगहो पर आतंकी हमले किये तो इसमे आश्चर्य की क्या बात? क्या आतंकवादियो ने कभी ऐसा वादा तो नही किया था कि वि ऐसा नही करेंगे?

भारत के हिन्दू अक्सर इस वात कि शिकायत करते है राजनीतिक दल चुनाव तो धर्म-निरपेक्षता के नाम पर जीतते है,लेकिन कार्य पध्दति मे छदम्य धर्म-निरपेक्षता अपनाते है। हाल ही पेश केन्द्रीय बजट मे कुछ ऐसे प्रवधान थे जिससे अल्पसंख्यक समुदाय यानि मुसलमानो को खुश किया जा सके। मक्का जाने वाले हाजी को सरकारी अनुदान मिलता है लेकिन बंग्लादेश से भाग कर आये अप्रवासी हिन्दू जो शिविरो मे नारकीय जीवन जी रहे है उनके लिए सरकार एक भी पैसा खर्च करने से हिचकती है। और तो और अमरनाथ यात्रा के लिए रहने की जगह पाने के लिए हिन्दुओ ने आन्दोलन का सहारा लिया ।
मुम्बई हमले से पहले भारत मे 2008 मे 1,111 लोग आतंकवादी हमलो मे मारेगए। इनमे से अधिकांश निर्दोष नागरिक है। ज्यादा लोगो की ह्त्या इस्लामिक चरमपंथियो ने की लेकिन 369 लोगो की हत्या माओवादियो और नक्सलवादियो ने की। पिछ्ले साल जब मै भारत मे था यहा पर आये दिन आतंकवादी हमले हुआ करते थे और सरकार के तरफ से भी कारवाई हुआ करती थी। पुलिस बल प्रत्येक हमले की अलग अलग जांच करते थे। बजाय हमले की जड मे जाने के। भारत इन हमलो से कोई सबक नही सीखा । नेपाल और उतरीपूर्वी भारत की खुली सीमा पर भी कोई ध्यान नही दिया जा रहा है । भारत मे आतंकवादी बंग्लादेश, चीन और नेपाल के रास्ते खुलेआम प्रवेश करते है। और यहा की सुरक्षा बल कुछ नही कर पा रहे है।
भारत के खुफिया विभाग का मानना है कि मुम्बई हमले मे पाकिस्तानियो का हाथ है। और अपने आरोप को साबित करने के लिए सबूत भी पेश कर रहे है या पेश करने को तैयार है। अब तक की मिल रही जानकारी के अनुसार शक की सुई पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा पर जा रहा है। इसके अलवा शक की सुई आईएसआई की तरफ भी जा रहा है। मजेदार बात यह है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री कुरैशी को भारत का दौरा बीच मे छोड कर पाकिस्तान लौटना परा। कुरैशी ने आईएसआई का इसमे हाथ होने इनकार किया और वादा किया वे आईएसआई को भारत भेजेंगे। लेकिन पाकिस्तान सरजमी पर कदम रखते हुए कुरैशी ने पलटी मारा और कहा कि प्रमुख नही प्रतिनिधि जायेगा।
भारत किस ढंग से आतंकवाद से निपटता है इस पर सबो की नजर रहेगी। आतंकवाद से निपटने दवाव यूरोप, ईरान, और अरव के एनजीओ संगठन के तरफ से भी अयेगा। ये सारे लोग भारत को सलाह देंगे की ठण्डे दिमाग से काम लेने का ताकि उनकी दुकान चलती रहे। ये यही लोग है जो इजरायल की कारवाई पर इस तरह की बाते करते है और मानवाधिकार की बात उठाते रह्ते है। अमेरिका को भी 11 सितम्बर के हमले के बाद इस तरह के संगठनो से वास्ता हुआ लेकिन उसने अपने राष्ट्रहित को सबसे आगे रखा न कि इन संगठनो के विचारो को। आप ही सोचिए कि किस देश की राजधानी से 100 किलोमीटर के अन्दर रुढिवादी इस्लामिक विचारो की पढाई होती है, और वहा से तालिबानी मानसिकता के लडाकू पैदा होते है। साउदी अरव, ईरान, पाकिस्तान, उत्तर है नही दुर्भाग्यवश यह देश भारत है और संस्थान का दारुल उलेमा सेमिनरी है ।
अमेरिका के सरजमी पर 11 सितम्बर के बाद कोई आतंकवादी हमला नही हुआ है। और इराक मे अपने लक्ष्य प्राप्ति की ओर बढ रहा है। इसकी वजह अमेरिकी समाज मे आतंकवाद से लडने के मुद्दे पर एका है। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने जो आतंकवाद के विरुध जो युद्ध की घोषणा की हैवह पद छोडने के बाद भी जारी रहेगा। लेकिन अमेरिका के नये निर्वाचित राष्ट्रपति ओबामा आतंकवादियो से बातचीत करने को उत्सुक है। अब यह भारत और उसके नेताओ पर निर्भर है कि पिछली गलतियो से सबक लेते हुए इस्लामिक आतंकवाद से कैसे निपटते है। क्या यहा के नेता कोई नयी नीति बनाते है या बुश के नीतियो को उधार ले कर उसका अनुसरण करते है। पहले अमेरिका इस्लामिक आतंकवाद के निशाने पर था लेकिन हाल की घटनाओ को देखकर लगता है कि अब भारत इसका केन्द्र बिन्दू बनने जा रहा है।
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