देश में औद्योगिक विकास का दर जो घटा है उसके लिए वित्तमंत्रालय और आरबीआई दोनो दोषी है। क्या वे निवेशकर्त्ता के विश्वास को पुन: जगा पायेंगे। यह चिंता का विषय नहीं चिंतन का विषय है।
औद्योगिक विकास दर में 3 प्रतिशत की गिरावट आयी है। जो पिछले 6 साल में सबसे कम है। यह गिरावट सोचने पर मजबूर करता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। विकास दर में जो धीमापन आया है उसके लिए सरकार की आर्थिक नीतियों के साथ उसका संयोजन ठीक से नही करना भी है। अर्थ शास्त्रियों के अनुसार कच्चे पदार्थों के दामों में वृद्धि , अमेरिकी अर्थ व्यवस्था में गिरावट भी इसके कारण हो सकते हैं। वर्तमान में जो बढ़ती मंहगाई है जिसके बारे में कहा जाता है कि मंहगाई एक वैश्विक समस्या है। पर इसके लिए आरबीआई की डालर खरीद नीति भी जिम्मेवार है। मंहगाई से लड़ने के लिए आरबीआई ने सी आर आर और ब्याज दरो में बढ़ोत्तरी कर दी । इसका परिणाम अब सामने आ रहा है।
अगर आरबीआई ने सीआरआर की बढ़ोत्तरी जारी रखी तो भारत का विकास दर 5 प्रतिशत से नीचे आ जायेगी। सरकार को अब जागने की जरूरत है। समस्या का जड़ कहीं और है। आरबीआई अंधेरे में तीर चला रही है। सी आरआर में वृद्धि करने से मूल पूंजी में वृद्धि होने लगी है। जिससे सीधा असर औद्योगिक विकास दर पर पड़ने लगा है। साथ ही साथ रुपये और डालर के खरीद फरोख्त पर समीति रोक लगा रखा है . जिसकी वजह से निवेशक निवेश करने से कतराने लगे है। इस तरह के प्रयासों से औद्योगिक विकास दर में कमी आने लगी है।
निवेशकर्त्ताओं पर दो तरफ से से प्रहार किया जा रहा है। पहला आरबीआई निवेशकर्त्ता पर घरेलू क्षेत्रो में ज्यादा पैसा लगाने पर जोर दे रहा है। दूसरा सरकार ऐसी नीति बनाने में असफल रही जिससेय निवेशकों को पैसा लगाने में फायदा दिखे। सरकार ने जिस तरह से दूध और उससे बने पदार्थों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। यह एक कदम ही निवेशकर्त्ताओं को हत्तोसाहित करने के लिए काफी है।
सभी निवेशकर्त्ता पुन: विचार करने पर विवश हो गये है कि क्या भारत अपना आर्थिक सुधार की गति को जारी रख पायेगा या इसमें शिथिलता आयेगी।