दक्षिण-पश्चिमी चीन के सिचुआन प्रांत में आए ताकतवर भूकंप से हुए जान-माल के भारी नुकसान से एक बार फिर प्रकृति के सामने हमारा बौनापन जाहिर हुआ है। भारत की तरह ही चीन भी इस समय तेज विकास के दौर से गुजर रहा है। वहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हो रहे हैं। चीन और भारत को बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के तौर पर उभरते हुए देखा जा रहा है। खास तौर से चीन पर तो पूरी दुनिया की निगाहें लगी हुई हैं। ऐसे में भूकंप जैसी आपदाएं विकास की राह में बाधा डालती प्रतीत होती हैं।
हालांकि इसकी पूरी उम्मीद है कि चीन अपने बल पर न सिर्फ नुकसान से जल्द ही उबर जाएगा पर हाल में म्यांमार में विनाशकारी समुद्री तूफान से हुई भारी क्षति के बाद चीन में आए भूकंप से कुछ सवाल फिर उभर कर सामने आते हैं। अहम सवाल यह है कि इंसान को आखिर कब तक ऐसी प्राकृतिक आपदाएं झेलनी पड़ेंगी, जिन पर उसका वश नहीं चल पा रहा है। बाढ़ और सूखे जैसे प्रकोपों पर तो फिर भी काबू पाया जा सकता है, लेकिन भूकंप, सूनामी, समुद्री तूफान जैसी प्राकृतिक घटनाएं साइंस की इतनी तरक्की के बावजूद हमारे लिए पहेली बने हुए हैं, तो थोड़ा अचरज जगता है।
चीन में आए ताकतवर भूकंप में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे सभ्यता अनजान हो। हमारी पृथ्वी भूगर्भीय संरचनाओं में अस्थिरता के लंबे दौर से गुजर रही है, इसलिए भूकंप हमारी नियति के साथ जुड़ा हुआ है। दुनिया में हर साल कोई दस करोड़ भूकंप आते हैं और हर सेकंड तीन भूकंप पृथ्वी के किसी न किसी कोने पर दर्ज ही किए जाते हैं। शुक्र है कि 98 फीसदी भूकंप समुद्र तलों में आते हैं और भूतल पर महसूस किए जाने वाले एक हजार भूकंपों में से सौ भूकंप ही नुकसान करने की क्षमता रखते हैं। पर चूंकि भूकंप गलतियों को सुधारने का मौका नहीं देता, इसलिए जरूरी है कि उससे यथासंभव बचा जाए। और कुछ नहीं तो वे उपाय तो किए ही जाएं, जिनसे भूकंप का असर कम होता हो।
भूकंप की सटीक भविष्यवाणी एक हल है, पर इसका माकूल इंतजाम होने तक जरूरी है कि भवन निर्माण में वे सारे प्रबंध हों, जिनसे कोई भी जलजला महसूस किए जाने के सिवा कोई असर हम पर न छोड़ता हो। साइंस इतना तो आगे बढ़ ही गई है कि इसके पुख्ता इंतजाम किए जा सकें। चीन के भूकंप का यह सबक है और बिना कोई देरी किए हमें इन उपायों पर गंभीर होना चाहिए।