केन्द्र सरकार के उस मुहिम पर जोर दार झटका लगा जिसके अर्न्तगत उच्च शिक्षा संस्था में 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुसंशा की गई थी। कलकत्ता उच्च न्यायलय ने इस पर रोक लगा दी।
यह आदेश न्यायधीश महराज सिंह ने समान्य छात्र सयन गुहा के द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। अपनी याचिका में गुहा ने आरोप लगाया कि केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा इन प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण देना सुप्रीम कोर्ट के 10 अप्रैल के निर्णय का उल्घंन है।इस पर केन्द्रीय मानव संशोधन मंत्रालय ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उच्च न्यायलय के इस निर्णय के विरूद्ध सरकार सुप्रीम कोर्ट जायेगी।
विरोध के मुख्य बिन्दु
कलकत्ता उच्च न्यायलय ने याचिका इस लिए स्वीकार किया कि क्रीमी लेयर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्घंन होता है।
याचिकाकर्त्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार स्नातक करने के बाद इस सुविधा का फायदा नही उठा सकते है, क्योंकि वे क्रीमीलेयर के अन्तर्गत आते है।
मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट में जाने की सोच रही है। दस अप्रैल के फैसले में पांच जजो की पीठ जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायधीश के जी बालकृष्णन कर रहे थे। सरकार को इस बात की इजाजत दी थी कि केन्द्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे शिक्षा संस्थानों में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है ।
सरकार ने उच्चतम न्यायलय के आदेश का उल्घंन करते हुए 20 अप्रैल को जो अधिसूचना जारी की थी उसमें पीजी में 27 प्रतिशत आरक्षण की बात की थी। सरकारी प्रवक्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से इस पर सरकार स्पष्टीकरण चाहेगी कि क्या ओबीसी का 27 प्रतिशत आरक्षण पीजी दाखिले में लागू नही होता है। इसके साथ ही सरकार न्यायलय से यह भी अनुरोध करने वाली है कि आरक्षण से संबन्धित सारी मुकदमें को दिल्ली में स्थान्तरित कर दिया जाय। अगर पीजी में नामंकन नही मिलने वाला होगा तो न्यायलय खुद 20 अप्रैल के अपने आदेश निरस्त कर देगी । सरकार अपना पक्ष रखेगी और उसको लगता है कि पीजी में भी ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलने चाहिए। इसी तरह का एक मुकदमा दिल्ली उच्च न्यायलय में भी है जिसमें सरकार द्वारा ओबीसी को आरक्षण देने के फैसलों की चुनौती दी गई है।