अपने बारे में संकलित किताब 'मोहि कहां विश्राम' के विमोचन समारोह में उन्होंने 15 मिनट के भाषण में एक बार भी सोनिया गांधी या राहुल का नाम नहीं लिया, जबकि संजय गांधी की तारीफों के पुल बांधे।
अर्जुन ने यह कहकर इंदिरा गांधी और संजय की प्रशंसा की कि ये दोनों कभी भी विचार व्यक्त करने से नहीं रोकते थे। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी में मैं इसके दुरुपयोग को लेकर आशंकित था। फिर भी दोनों का आशीर्वाद था।
उन्होंने गांधी- नेहरू परिवार और वफादारी के सवाल को भी उठाते हुए अपनी रहस्यमय राजनीतिक शैली में कहा कि 'ताज्जुब की बात है कि नेहरू-गांधी परिवार में वफादारों को समझने की असीम क्षमता रही है। जो दिखावे की वफादारी करते हैं, इनकी पहचान भी है।'
अर्जुन सिंह ने इससे आगे कहा कि मुझे अपनी प्रतिबद्धता को अक्षुण्ण बनाए रखने की चुनौती है। वफादारी में कमी आने से रोकना है। अर्जुन सिंह ने अपने पंजाब के राज्यपाल काल का भी जिक्र किया। मगर राज्यपाल बनाने वाले राजीव गांधी का नाम नहीं लिया। उन्होंने यह भी कहा कि मुझे आगे बढ़ने से रोकने की कोशिशें आज से नहीं, नेहरू के समय से हो रही हैं। प्रधानमंत्री इस दौरान बिल्कुल खामोश बैठे रहे। पूरे समारोह में मनमोहन सिंह एक शब्द भी नहीं बोले।
इस समारोह से पहले कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. शकील अहमद ने अर्जुन सिंह के विचारों से असहमति जताते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष फैसले लेने में हमेशा साफ और पारदर्शी रही हैं। अर्जुन सिंह खुद उस सीडब्ल्यूसी के सदस्य हैं, जो पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई है। यही नहीं, सोनिया यूपीए की भी चेयरपर्सन हैं। वहां भी विभिन्न घटक दलों से राय मशवरा करती हैं।
डॉ. शकील ने और सवालों के जवाब देने से इनकार करते हुए कहा कि अभी किताब आधिकारिक रूप से रिलीज नहीं हुई है। फिलहाल मैं इतना ही कहूंगा कि पार्टी अर्जुन सिंह के विचार से सहमत नहीं है।
विमोचन कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी जैसी शख्सियतों की मौजूदगी में अर्जुन सिंह ने कहा कि मैं राजनीति के विषय को नहीं छेड़ना चाहता। व्यथित लग रहे अर्जुन सिंह ने अपने भाषण के दौरान भावुक होते हुए कहा कि अनेक झंझावातों से गुजरा हूं, मगर सिर ऊंचा कर चलता हूं। उन्होंने विश्वास ही विश्वास की जननी जैसी सूक्ति बोलते हुए यह भी कहा कि राजनीति में नुकसान-फायदे होते रहते हैं।