हाल ही में भारत यात्रा के दौरान मैं भारतीय मीडिया द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की खबरें देख कर मैं हैरान रह गया। अगर मैं अमेरिका की राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता होता तो उन खबरों को देख कर मैं दो नतीजों पर पहुंचता। पहला, क्या रिपब्लिकन पार्टी को अपना प्रत्याशी ही नहीं खड़ा करना चाहिए क्योंकि उनके चुनाव जीतने की संभावनाएं बहुत कम हैं। और दूसरा, डेमोक्रेट पार्टी के दोनों उम्मीदवारों में, जो राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने की होड़ है, से एक उम्मीदवार को मिथक बना दिया गया है।
कुछ हद तक एक सितारे की तरह, एक अकेला योद्धा जिसने अमेरिका को अपने मोहजाल में फांस लिया है और पूरी दुनिया को एक आशा की किरण दिखाई है “नए अमेरिका” की। अब चाहे कोई इसका कुछ भी मतलब निकाले। उसका नाम है बराक ओबामा। अमेरिका के बाहर के अधिकतर पत्रकारों को अमेरिकी राजनीति के बारे में उथली जानकारी है, लेकिन सच यह है कि मेरे देश अमेरिका में भी मीडिया का झुकाव इसी राजनीतिज्ञ की ओर है। और सच पूछिए तो वह राजनेता ही तो है।
मुझे यह समझने में बहुत कठिनाई हुई कि क्यों लोग उसे पसंद करते हैं। वास्तविकता यह है कि ओबामा के पूरे राजनीतिक जीवन में भाग्य ने लगातार उसका साथ दिया है। उसे इस बात का भी फायदा मिल रहा है कि अमेरिका की जनता दोनों राजनीतिक पार्टियों, डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, से अलग-थलग महसूस कर रही है। ओबामा कहते हैं कि “मुझे वोट दीजिए, मैं दूसरे लोगों की तरह अपने अनुभवों के बोझ तले दबा हुआ नहीं हूं”, और इस तरह उसने उन सभी लोगों को जो राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं, चुनाव से विमुख हैं और जवान हैं को अपने मोहजाल में फांस लिया है। हालांकि इसका परिणाम उसके राष्ट्रपति बनने के पक्ष में जाता है कि नहीं इसका परिणाम तो आनेवाली गर्मियों के बाद ही पता चलेगा। क्योंकि उसके बाद ही चुनाव गंभीर दौर में पहुंचता है और इसके बाद ही पता चलेगा कि जो उत्साह उन्होंने लोगों में बनाया है वह कायम रहता है या गायब हो जाता है। पत्रकारों को आनेवाले सितंबर के महीने में इसी का इंतजार रहेगा।
मुझे नहीं पता कि पत्रकार तब तक बराक ओबामा के कल्पना के घोड़ों पर सवार रहेंगे या नहीं, लेकिन बाकी पत्रकारों के मुकाबले जो सीनेटर ओबामा के बारे में लिखते हैं, मेरा अनुभव कुछ अलग हटकर है। मैं और बराक ओबामा दोनों ही शिकागो से हैं(दुनिया के सबसे राजनीतिक तौर पर जागरुक शहर में देखा है)। एक सीनेटर के रुप में वह मेरे राज्य, इलियोनोयस यानी मेरा प्रतिनिधित्व अमेरिका की सीनेट में करते हैं। मेरे उनके साथ मानवाधिकार के गंभीर मुद्दों पर निजी संबंध भी हैं और मैनें देखा है कि उनके शानदार और मनमोहक भाषणों में कितना दम है। इसलिए मेरा विश्वास है कि मेरे पास कुछ आधार हैं जिसके आधार पर मैं उस काल्पनिक मसीहा को अस्वीकार करता हूं जो अंतर्राष्ट्रीय प्रेस में एक लहर के समान बाधाओं को पार कर चलता जा रहा है।
पहली कल्पनाः कि बराक ओबामा ने अपने राजनीतिक जीवन में कुछ काम किया है। जब भी मैं बराक ओबामा के समर्थकों से एक, सिर्फ एक किसी भी काम के बारे में पूछता हूं जो उसने अपने राजनीतिक जीवन में संपन्न किया हो तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता है। वो बहाने बनाएंगे और कहेंगे कि उसने लोगों को प्रेरित किया है या लोगों को एक साथ लाने की कोशिश की है लेकिन वो किसी एक काम के बारे में नहीं बता पाएंगे जो उसने किया हो। ऐसा इसलिए क्योंकि उसने कुछ किया ही नहीं है। किसी भी सीनेटर का सबसे महत्वपूर्ण काम होता है नए प्रस्ताव का अनुमोदन करना या उसे पास कराना। लेकिन अपने तीन साल के सीनेट कैरियर में “ओबामा ने अमेरिकी सीनेट में पास हुए किसी भी बिल का अनुमोदन नहीं किया है, एक भी नहीं”। उसका नाम भले ही कुछ पूर्ववर्ती बिलों के संशोधन या फिर किसी और सीनेटर द्वारा पास कराये गए बिल में मददगार के रुप में पाया जा सकता हैं। कानून निर्माता अधिकतर ऐसा काम या तो आंकड़ों का खेल खेलने के लिए करते हैं या फिर पार्टी का आभार जताने के लिए। उदाहरण के लिए, ओबामा के लोगों ने एक ही दिन कई बिलों का प्रस्ताव रखा जिसके पक्ष में एक भी नहीं या नहीं के बराबर प्रायोजक थे, जिन बिलों का प्रस्ताव किया गया उनका फिर आगे कुछ पता नहीं चल पाया। लेकिन सीनेटर जॉन मैक्केन, रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार, ने पांच बिलों का प्रस्ताव रखा और इन बिलों के आधार पर उसी अवधि के दौरान कानून भी बने। मैक्केन ने नेतृत्व के गुणों के अलावा कई मुख्य प्रस्ताव जैसे यातना को गैरकानूनी बनाना, चुनाव के लिए आर्थिक मदद और न्यायपालिका के साथ गतिरोध जैसे मामलों को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दूसरी कल्पनाः कि बराक ओबामा ऐसी शख्सियत है जो दोनों दलों के लोगों को एक साथ लाता है। इलियोनोयस की सरकार का एक सदस्य होने के नाते, जो कि सीनेटर बनने के पहले ओबामा एकमात्र राजनीतिक पद पर आसीन थे, और उस पद पर रहते हुए, उन्होंने वामपंथी रवैया अपनाए रखा। उन्होंने विभिन्न वर्ग के लोगों के मध्य समन्वय स्थापित करने की दिशा में कोई पहल नहीं की। उनका चुनाव जीतना महज एक संयोग था क्योंकि उनके दो प्रतिद्वंदी बड़े आरोपों के चलते दौड़ से बाहर हो गए। तो जैसा कि उनके समर्थक लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं कि यह लोगों को साथ लाने का एक उपाय था, एक नासमझी है।
तीसरी कल्पनाः कि बराक ओबामा एक नए तरह के राजनीतिज्ञ हैं, जिसपर भ्रष्टाचार और स्वार्थपरक व्यवहार के कोई आरोप नहीं है। ओबामा के लोग दिन-रात सिर्फ इस काम में लगे हुए हैं कि कैसे शिकागो की मीडिया से उसके प्रतिनिधियों को दूर रखा जा सके। ऐसा क्यों? क्योंकि शिकागो की राजनीतिक व्यवस्था में ओबामा के कुछ काले अध्याय हैं जो उसकी वर्तमान की साफ-सुथरी छवि के विरुद्ध है। एक असम्यक प्रभाव डालने के आरोपी, टोनी रेजको, ने ओबामा के साथ एक समझौता किया जिसके तहत ओबामा को मदद दी गई। इस सूचना के अमेरिका के अटार्नी की जानकारी में आने के बाद से इस बारे में और तहकीकात जारी है। शिकागो में इन्हीं सक्रिय तत्वों के साथ मिलकर ओबामा ने एक राजनीतिक मशीनरी स्थापित कर रखी है। क्या इससे ओबामा राजनीतिक रुप से बड़े पैमाने पर भ्रष्ट सिद्ध होते हैं? नहीं, लेकिन यह उस नए प्रकार के राजनीतिज्ञ की तरह भी नहीं दिखते जैसा ओबामा लोगों को अपने बारे में बताते हैं। शिकागो की गलियों में, जहां मैं पला-बढ़ा वहां हम कहेंगे कि ओबामा अच्छी-अच्छी बातें करता है परंतु वास्तविकता ऐसी है नहीं।
चौथी कल्पनाः कि बराक ओबामा भारत, अमेरिका तथा इस्लामी आतंक से जूझ रहे लोगों के लिए विनाशकारी सिद्ध नहीं होगा। यह उन सभी कल्पनाओं में से सबसे महत्वपूर्ण कल्पना है जिसे ध्वस्त करना आवश्यक है। ओबामा ने अनेक बार कहा कि जब वो राष्ट्रपति बनेंगे तो वो ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद और उनके जैसे विश्व में आतंकवाद को समर्थन देनेवाले अन्य तत्वों के साथ बैठकर बात करेंगे। अपने अनेक अनुयायियों की भांति ओबामा भी आज अंतर्राष्ट्रीय जेहाद के खतरे को ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि इन आतंकवादियों का दिल जीतने के लिए वे समझौते करेंगे और वह इन आतंकवादियों को एक उपस्थित खतरे के रुप में नहीं देखते।
उन्होंने जिन थोड़े से कानूनों को प्रायोजित किया है उनमें से एक सीनेट का वह प्रस्ताव है जिसमें ईरान के विरुद्ध बल प्रयोग को मना किया गया है। सौभाग्यवश सीनेट में उन्हें इसके लिए कोई सहयोगी नहीं मिला। ओबामा ने विदेशी खुफिया बिल के पक्ष में भी वोट नहीं दिया और 11 सितंबर 2001 के हमले का अध्ययन करनेवाले आयोग की सिफारिशों पर अमल का भी विरोध किया। और वह उन दस सीनेटरों में से एक हैं जिन्होंने इराक में अमेरिकी सेना को और आर्थिक सहायता दिए जाने का विरोध किया था क्योंकि सेना की इराक से वापसी की कोई तिथि निर्धारित नहीं थी।
क्या आपको इसमें कोई परिपाटी नजर आती है?
लेकिन ओबामा इनमें सबसे ऊपर हैं। नैतिक रुप से कायर और ऐसा व्यक्ति जो कि इस्लामी आतंक के पीड़ितों के पक्ष में खड़ा होने का साहस नहीं कर पाता। 2003 से मैं बांग्लादेश के जिहाद विरोधी पत्रकार सलाहुद्दीन शोएब चौधरी को जेल भेजे जाने के विरुद्ध सफलतापूर्वक अभियान चला रहा हूं इस संबंध में मैनें अमेरिकी संसद के 15 प्रतिशत सदस्यों का समर्थन प्राप्त कर लिया है। उनका उत्तर काफी सकारात्मक रहा है सभी ने सहयोग किया और उनमें से सभी ने सार्वजनिक रुप से अपनी सक्रियता दिखाई। संयुक्त रुप से दोनों सदनों ने बांग्लादेश के व्यापार प्रस्ताव को अपनी प्रतिक्रियास्वरुप रोक कर रखा। वास्तव में कुछ ही दिनों के भीतर मैनें एक वामपंथी सीनेटर को भी संपर्क किया और उनका भी रुख सकारात्मक रहा। वास्तव में जिस भी सीनेटर से मेरा संपर्क हुआ सबने सकारात्मक रुख दिखाते हुए सहयोग किया। आप ध्यान दें, सभी ने सिवाय बराक ओबामा के। बराक ओबामा ही यूएस कांग्रेस के वह सदस्य थे जिन्होंने मानवाधिकार के इस विषय पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई। मैनें उनसे व्यक्तिगत रुप से और उनके स्टाफ से दो बार संपर्क किया और उनके समक्ष साक्ष्य भी प्रस्तुत किए परंतु उन्होंने कुछ नहीं किया। अब विश्व को अमेरिका का ऐसा राष्ट्रपति नहीं चाहिए जो कि इस्लामवादी आतंकवाद के सामने खड़ा न हो सके।
और वह मेरे मित्र बराक ओबामा हैं।