सोवियत क्रांति के बाद पहली बार हुआ है कि एक पुराने नेता अपने नये साथी को सत्ता सौंपने के बाद साथ नहीं छोड़ा अपितु साथ देने का वादा भी किया। पुतिन के आठ साल के शासन के बाद इतनी आसानी से सत्ता का हस्तांत्रण अपने आप में काबिले तारीफ है। पुतिन ने रूस को पुन: आर्थिक और सैनिक तौर पर मजबूत बनाने के साथ-साथ इसकी विश्व में खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने में मदद की। पुतिन लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित अपने सहयोगी और शिष्य मेदवेदेव को सत्ता सौंप दी।
रूस में पहली बार सत्ता के दो केन्द्र होंगे एक प्रधानमत्री का और दूसरा राष्ट्रपति का। सत्ता का जो फार्मूला है उसे रूस में नया राजनीतिक सुधार के साथ, संसद को ज्यादा अधिकार, स्वतंत्र न्याय व्यवस्था और निष्पक्ष मीडिया का निर्माण करने में मदद मिलेगी।
मेदवेदेव और पुतिन की जोड़ी देश में स्थाईत्व की गारंटी देती है। रूस के ज्यादा से ज्यादा लोगो का समर्थन पुतिन को प्राप्त हैं। पद छोड़ने से पहले एक सर्वेक्षण में 80 प्रतिशत जनता पुतिन को पसंद करती थी। मेदवेदेव ने भारी बहुमत से राष्ट्रपति चुनाव जीता है। मेदवेदेव की उम्र मात्र 42 वर्ष है, वे बुद्धिमान और लचीले विचारधारा के हैं । पुतिन को समस्या की काफी समझ है दोनों की जोड़ी एक सपने जैसी टीम का निर्माण किया है। दोनों ने मिलकर 2020 तक रूस को पूरी तरह से आधुनिक राष्ट्र बनाने की योजना बनाई है। रूस जिसकी अर्थ व्यवस्था तेल पर आधारित है उसको बदल कर तकनीकी तौर पर सक्षम अर्थ व्यवस्था का निर्माण करना चाहते है। पिछले आठ वर्षों से दोनों मिलकर काम कर रहे हैं , रूस को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
भारत के लिए अच्छी खबर है कि पुतिन के समय ही भारत ने रूस के साथ सामरिक समझौता किया था। मास्को के नेतृत्व परिवर्तन दिल्ली के लिए एक मौका है कि दोनो देशों के द्विपक्षीय सम्बन्ध में प्रगढ़ता लाने का नये सिरे से प्रयास किया जाये।