इस बार कम्युनिस्ट, इस्लामिक कट्टरपंथियों के साथ एकता कायम कर रहे थे।
वर्ष 2004 में अलकायदा के आतंकवादी अमरिकी फौज, जिसने अफगानिस्तान का महत्वपूर्ण ठिकाना तबाह कर दिया, से अपनी जान बचाते भाग रहे थे। अगले दो सालों तक पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ की फौजों ने उनका पर्वतीय इलाकों में पीछा किया, लेकिन अधिकतर पाकिस्तानी, इस्लामवादियों के विश्वस्त हैं। इसलिए सीमा सुरक्षा बल के दोस्ताना सिपाहियों ने उन्हें सुरक्षित पाकिस्तान से आतंकवादियों द्वारा नियंत्रित कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे प्रमुख मुद्दा, में पहुंचा दिया। वहां से आतंकवादियों को नो-मेन्स लैंड से होते हुए नेपाल ले जाया गया, जहां उन्होंने आतंकी अड्डे बनाए। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि नेपाल में लगभग शतप्रतिशत जनसंख्या हिंदू या बौद्ध है इसलिए उसके तालिबानीकरण होने की संभावना कम है। लेकिन नेपाली राजा ज्ञानेन्द्र ने, वामपंथियों के दशकों लंबे खूनी विद्रोह के जवाब में, सारी शक्तियों को अपने पास केन्द्रित कर लिया। लेकिन इससे सामाजिक अशांति फैल गई और सीमाओं पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। नेपाल में स्थित पाकिस्तानी दूतावास में इस्लामवादियों ने वामपंथियों के साथ एक करार किया ताकि आतंकी अड्डे स्थापित किए जा सके।
इस्लामवादी नेपाल में रुचि नहीं रखते थे, कम-से-कम अभी तो नहीं। लेकिन नेपाल के नजदीक स्थित दुनिया के तीसरे सबसे बड़े मुस्लिम देश बंग्लादेश में उनकी दिलचस्पी जरुर थी। बंग्लादेश की आबोहवा इस्लामवादियों के लिए मनमाफिक थी। सऊदी और कुवैती दान की मदद से इस्लामवादियों ने देश के लगभग सभी सामाजिक संगठनों में अपनी पैठ बना ली थी और वर्ष 2001 में सत्ता के हिस्सेदार भी बन गए थे। लगभग सभी ने यह माना कि इस्लामवादी आनेवाले चुनाव में इतनी सीटों पर कब्जा कर लेंगे जिससे कानून मंत्रालय द्वारा शरियत प्रणाली को पंद्रह करोड़ की आबादी वाले देश पर लागू कराया जा सके। इस्लामवादी अपने इरादों में लगभग सफल हो चुके थे लेकिन सैनिक विद्रोह द्वारा सत्ता पलट के कारण यह रोका जा सका। सहयोगी दल बंग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) ने लंबित चुनाव को इस तरह से “फिक्स” किया कि आश्चर्यजनक रुप से दुनिया के हरेक पश्चिमी संसदीय व्यवस्था ने चुनाव तुरंत न कराने की गुजारिश की। पश्चिम ने सैनिक शासन का स्वागत बंग्लादेशी लोकतंत्र की जान बचाने वाले के रुप में की है।
आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई बीएनपी ने चुनाव की घोषणा इसलिए की ताकि काले पैसे का प्रवाह जारी रह सके, लेकिन इसके इस्लामवादी सहयोगी का इरादा कुछ और ही था। वो बीएनपी की नकली वोटर लिस्ट के द्वारा जनता में अपने सहयोगियों, जो नेपाल से भारत की उत्तर-पूर्व सीमा को पार करके आ रहे थे, को सुरक्षा दे रहे थे। भूतपूर्व बंग्लादेशी गृह मंत्री लुत्फुजम्मान बाबर के अनुसार, बीएनपी ने इस्लामवादियों के साथ संबंध बनाकर रखे ताकि इस्लामिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखा जा सके। बाद में बाबर की अपने सहयोगियों (इस्लामवादियों) से अनबन हो गई खासकर, अमरिका और इसरायल समर्थक मुस्लिम पत्रकार सलाहुद्दीन शोएब चौधरी, के मुद्दे पर। बांग्लादेशी सूत्रों के मुताबिक, एक समय ऐसा भी आया जब, इस्लामवादियों ने बीएनपी के राजनीतिक प्रतिद्वंदी तथा वामपंथी ट्रेड यूनियनों के साथ मिलकर कपड़ा बनाने वाली मिलों के खिलाफ दंगे करवाने की साजिश की थी।
सैनिक विद्रोह होने के बाद से इस्लामवादी शांत हैं लेकिन वो मौका मिलते ही अपना अगला दांव खेलने को तैयार हैं। हांलांकि सैनिक शासन ने दोनों, इस्लामवादियों और देश में फैले हुए भ्रष्टाचार से लड़ने की अपनी इच्छा का खुलासा किया, लेकिन वह सिर्फ भ्रष्टाचार से ही लड़ पाने में सफल हो पाई। नेपाली माओवादी जो कई दशकों से लड़ रहे थे उन्हें सत्ता में स्थान मिल गया है। इस सहयोग की नकल अब बाकी जगहों पर भी की जा रही है।
भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में ज्यादातर लोग इसी गठजोड़ के द्वारा मारे जा रहे हैं। 1971 में बांग्लादेश का जन्म होने के बाद से ही, इस्लामवादी देश के कानून वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट (वीपीए) का इस्तेमाल देश से गैर-मुस्लिमों को भगाने के लिए कर रहे हैं। यह कानून सरकार को गैर-मुस्लिमों की संपत्ति को हड़प कर अपनी पसंद के मुसलमान को देने का अधिकार देता है, इसकी वजह से गैर-मुस्लिम (ज्यादातर हिंदू) देश को छोड़कर भाग रहे हैं। यह जाति विशेष के लोगों का सफाया करने के अलावा कुछ नहीं है। यह धार्मिक भेदभाव और अमानवीय व्यवहार है। दसियों लाख लोगों के साथ ऐसा व्यवहार हो चुका है। डॉ सचि दस्तादार, जिन्होंने इस घटना पर दशकों तक अध्ययन किया, सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों का विश्लेषण करके पाया कि सिर्फ वर्ष 1990 में 13 से लेकर 33 लाख एकड़ हिंदू जमीन को जब्त किया गया। लोगों को मार दिया गया, संपत्ति को क्षतविक्षत किया गया या फिर सामूहिक बलात्कार किया गया, इसके साथ ही कानून के संरक्षण में चोरी भी की गई। शुरुआत में लुटेरों ने निजी तौर पर काम किया लेकिन, भुक्तभोगियों के अनुसार, बाद में सरकारी अधिकारियों और वर्दीधारियों ने भी इन दस्तों का नेतृत्व किया।
वीपीए एक्ट का सबसे ज्यादा फायदा पार्टी के सदस्यों या अधिकारियों को ही मिला, जिन लोगों के उपर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेवारी सबसे ज्यादा थी उन्होंने ही उसका दुरुपयोग किया। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि वाशिंगटन में बंग्लादेश के राजदूत, एम हुमायूं कबीर, ने कहा “मौजूदा सरकार का वेस्टेड प्रोपर्टी एक्ट में इस कार्यकाल के दौरान संशोधन करने की कोई मंशा नहीं हैं” और मौजूदा सरकार का कार्यकाल की अवधि ही निश्चित नहीं है।
बुरी तरह से चोट खाए हुए और लुटे-पिटे रिफ्यूजी अपने पड़ोस में स्थित दुनिया के सबसे बड़े हिंदू देश की ओर शरण लेने के लिए भागे। लेकिन बंग्लादेश की सीमा पर स्थित राज्य पश्चिम बंगाल में 1977 से ही साम्यवादी सरकार है जिसने शरणार्थियों को कोई मदद नहीं प्रदान किया। कट्टर वामपंथियों ने इस्लामवादियों के साथ मिलकर साम्यवाद के मूलभूत सिद्धांतों को भी भुला दिया। वीपीए के भुक्तभोगियों को पहले कैंप में रखा जाता और फिर जब सरकार उनकी जमीन जब्त करने के बारे में विचार कर लेती तो उन्हें जबरन विरोध प्रदर्शनों के लिए भेज दिया जाता था। पश्चिम बंगाल के स्टालिनवादी सरकार ने इन्हें शरणार्थी का दर्जा देने या कोई न्यायिक सहायता देने से इनकार कर दिया, के बावजूद की कई लोग दशकों से वहां रह रहे थे। राज्य की सरकार ने सीमा पार से होने वाले घुसपैठ और मुसलमान समर्थित हिंसा की ओर भी आंखे मूंद ली।
डॉ दस्तादार के अनुसार यह समस्या राजनीतिक होने के साथ ही नैतिक भी है। भुक्तभोगी प्रबल रुप से साम्यवाद विरोधी हैं। कम्युनिस्टों को डर है कि अगर उन्हें नागरिकता दी गई तो सत्ता उनके हाथों से फिसल जाएगी। दस्तादार कहते हैं कि “इसके साथ ही (पश्चिम बंगाल) राज्य सरकार के अधिकतर कर्मचारी बांग्लादेशी हैं और इस्लामवादियों द्वारा मान्यताप्राप्त लोगों को ही पश्चिम बंगाल में रहने का सुरक्षित ठिकाना दिया जाता है“।
कोई भी संस्था इस काम में अपना किरदार नहीं निभा रही है। भारत सरकार ने पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार के प्रति नरम रवैया अपना रखा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस मामले पर चुप्पी साध रखी है और शरणार्थियों को शरणार्थी दर्जा देने से इनकार कर दिया है, इस प्रकार इन्हें न तो वैधानिक न ही वित्तीय सहायता प्राप्त हो रही है। कथित तौर पर मानवाधिकार समूह जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वाच जैसे संगठन इस ज्वलंत समस्या पर तो हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, लेकिन उनके पास अमरिका और इसरायल जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आलोचना करने का समय है। इसलिए, इस साल की शुरुआत में जब एक भुक्तभोगी जो करीब 1000 परिवारों का नेतृत्व कर रहा है ने मुझसे संपर्क करके मदद मांगी तब मैने वहां जाकर इस समस्या पर और छानबीन करने के फैसला किया है।
जर्मनी और रुस के बीच 1939 के एक-दूसरे पर हमला न करने की संधि अंततः टूट गई थी और इससे दोनों पक्षों को आने वाले युद्ध की तैयारी करने का समय मिल गया जिसमें लाखों लोग मरे। दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी का घर दक्षिण एशिया है इसलिए बदले की कार्रवाई भी यहां बड़े पैमाने पर देखने को मिल सकती है।