लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसियों तथा अन्य संगठनों को मिलने वाली रिपोर्ट से ऐसे गठजोड़ के होने का खुलासा होता है। अब यह एकता चाहे, मिलकर काम करने की हो या फिर विश्व में किसी नयी व्यवस्था को लागू करने के लिए हो, साथ-साथ काम करते हुए ये दोनो संगठन किसी भी ऐसी व्यवस्था के खिलाफ हैं जो अमरिका या पश्चिमी देशों का थोड़ा भी समर्थन करे।
2001 के अंतिम महीनों में अमरिकी फौज ने अलकायदा को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंका और उनकी आतंकवाद का उत्पादन करनेवाली अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया। यहां से अलकायदा पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों में चले गए जहां पर पाकिस्तानी शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के सैनिकों ने उनके छुपने के ठिकानों पर हमला करना शुरु कर दिया। ओसामा बिन लादेन के आतंकी संगठन ने इसका जवाब अलकायदा का विकेन्द्रीकरण करके दिया, लेकिन दल को फिर भी एक ऐसे सुरक्षित ठिकाने की तलाश थी जहां खुले तौर पर वो अपना काम कर सकें। अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों की उपस्थिति, पाकिस्तान का सुरक्षित ठिकाना न रह जाना, और अमरिका की मध्यपूर्व में मजबूत उपस्थिति साथ ही ईरान पर कड़ी नजर के बाद अलकायदा का अगला ठिकाना कहां हो सकता था?
अरब देशों में अमरिका की उपस्थिति होने के अलावा वहां अड्डा न बनाने के सामरिक और रणनीतिक कारण हैं। अपनी प्राकृतिक संपदा के कारण मध्यपूर्व पर हमेशा दुनिया की नजर रहती है लेकिन आतंकवादी अच्छी तरह से तभी काम कर सकते हैं जब लोकतांत्रिक ताकतों की नजर उनके उपर न रहे। साथ ही अरब देशों में सपाट तथा खुले मरुस्थलों में छुपने के ठिकानों का अभाव है।
दूसरी ओर दक्षिण एशिया में उन्हें मिली पर्वतों में छुपने की जगह, उबड़-खाबड़ जमीन और ऐसे सुदूर गांव जहां पहुंचना भी मुश्किल है। अंततः दक्षिण एशिया मुस्लिमों के प्रवेश द्वार की तरह है। अरब देश पहले ही काफी हद तक कट्टरपंथी हो चुके हैं और उनकी सामाजिक संस्थाओं पर इस्लाम का मुलम्मा चढ़ चुका है। लेकिन अरब देश और ईरान को छोड़कर, एशिया के मुस्लिम अभी भी पूरी तरह से इस्लामवादियों के हाथ की कठपुतली नहीं बने हैं और इस्लामवादियों के लिए वो एक चुनौती के साथ ही एक मौके की तरह हैं। दक्षिण एशिया ही दुनिया के हरेक पांच मुसलमानों में चार का निवास स्थान है।
लगता है कि आतंकवादियों ने इसका जवाब ढूढ़ निकाला है दक्षिण एशिया के वामपंथियों के साथ एक अपवित्र गठबंधन करके।
वर्ष 2004 की शुरुआत में ही हिमालय की गोद में बसे देश नेपाल के एक अमरिकी ऑफिसर ने कहा कि “अलकायदा का अफगानिस्तान और पाकिस्तान का बसेरा उजड़ चुका है और वो नए घर की तलाश में हैं” और साथ ही यह भी कहा कि यह नया ठिकाना नेपाल हो सकता है। अमरिकी अधिकारी के विचार इस छोटे देश में बढ़ती उथल-पुथल और अस्थिरता पर आधारित थे, जिसके कारण उसका विश्वास था कि नेपाल इस्लामिक आतंकियों के लिए एक आसान ठिकाना बन सकता है। अमरिकी अधिकारी का ध्यान तत्कालीन वैध राजतंत्र और नेपाली माओवादियों के बीच जारी युद्ध पर था जिसने करीब तेरह हजार लोगों की जान ले ली थी।
नेपाल, अफगानिस्तान से पाकिस्तान के कबीलाई इलाके को पार करने के बाद कश्मीर के पर्वतीय हिस्से से सटा हुआ यह देश भारत-चीन सीमा के बिल्कुल नजदीक है। उबड़-खाबड़ तथा सुदूर इलाकों में अलकायदा के लड़ाकुओं को संरक्षण मिला वहीं भारतीय खुफिया एजेंसियों का यह भी दावा है कि उन्हें पाकिस्तान से सहानुभूति रखनेवालों से मदद भी मिल रही है। विवादित कश्मीर का अधिकतर हिस्सा तीन मुख्य आतंकवादी संगठनों के नियंत्रण में है जो राजनीतिक और आध्यात्मिक तौर पर अलकायदा से जुड़े हुए हैं। इससे नेपाल की स्थिति और भी डांवाडोल हो गई।
1 फरवरी 2005 को राजा ज्ञानेन्द्र ने, देश की सभी शक्तियों का केन्द्र अपने हाथों में कर लिया, संसद को भंग और प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दिया गया, इस कदम के पक्ष में यह दलील दी गई कि माओवादियों से पूरी क्षमता से लड़ने के लिए यह आवश्यक कदम है। लेकिन राजधानी काठमांडू में उठी सामाजिक अशांति को दबाने के कारण राजा को सरकारी ताकतों का इस्तेमाल विद्रोहियों पर करने का मौका ही नहीं मिला। सत्ता के इस केन्द्रीकरण के खिलाफ अगले एक साल में राजधानी की गलियों में फैली हिंसा के बाद विभिन्न दलों ने, जिसमें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से लेकर वामपंथी भी शामिल थे, राजतंत्र को हटा कर साम्यवादी तानाशाह को लाने की मांग की। लगातार फैलती अशांति और सरकार द्वारा अपनी पकड़ को बरकरार रखने की कोशिशों के बीच सीमा की सुरक्षा नहीं के बराबर रही और इस परिदृश्य में अमरिकी अधिकारी की चिंताएं भविष्यदृष्टा के समान लगीं।
20 अप्रैल, 2006 को राजा ने पहले हथियाए गए सभी अधिकारों को छोड़ दिया, लेकिन वर्ष 2006 के शुरुआती दिनों में भारतीय इंटेलीजेंस सर्विस का कहना था कि अल-कायदा के कारिंदे कई नेपाली शहरों में काम कर रहे है। भारतीय अखबार पॉयनियर में छपी एक खबर के अनुसार “भीषण अंदरुनी समस्याओं से जूझता नेपाल, अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के ठिकाने के लिए एकदम सही वातावरण उपलब्ध कराता है”।
लेकिन इसका परिणाम नेपाल के शक्तिशाली माओवादियों और इस्लामवादियों के बीच युद्ध के रुप में नहीं हुआ क्योंकि इनके लिए नेपाल सिर्फ एक पड़ाव भर था। नेपाल की जनसंख्या का 89 प्रतिशत हिंदू है और बाकी सब बौद्ध। इस कारण से इस देश के इस्लामिक राज्य बनने की संभावनाएं क्षीण हैं। लेकिन अगर उस रास्ते को और आगे बढ़ाया जाए जो पहले अफगानिस्तान से शुरु होकर नेपाल तक आया तो इस्लामवादियों को पहले तैयार लक्ष्य मिला, बंग्लादेश, जनसंख्या के हिसाब से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मुस्लिम देश।
बंग्लादेश एक लोकतंत्र होने के बावजूद, इस्लामवादियों को अधिकार जमाने के लिए तैयार मिला और इस्लामवादी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का इस्तेमाल सत्ता प्राप्त करने के पश्चात इसका विनाश करना चाहते हैं। देश में आम चुनाव जनवरी में होने वाले हैं लेकिन अमरिका में बंग्लादेश के राजदूत शमशेर एम चौधरी सरकार के कथन “इस्लामवादी कमजोर हैं” के समर्थन में नहीं हैं, क्योंकि सूचनाओं से कुछ और ही परिणाम की आशंका है। गरीबी उन्मूलन में कुछ सफलता मिलने के बावजूद अधिकांश बंग्लादेशी गरीब हैं और उन्हें सत्ताधारी बंग्लादेश नेशनल पार्टी और विपक्षी अवामी लीग पर स्थिति को सुधारने का कोई भरोसा नहीं है। आधारभूत संरचना का अकाल राजधानी में है, कई जगहों पर पुरानी व्यवस्था ही चली आ रही है और अंतरराष्ट्रीय सर्वे में बंग्लादेश हमेशा सबसे भ्रष्ट देशों में पहले या दूसरे क्रमांक पर आता है।
बीएनपी और बीएएल के बीच आने वाले चुनाव को लेकर उपजे विवाद ने पार्टियों के लिए लोगों के समर्थन में कमी लाई है। दिन-प्रतिदिन लोग इस्लामवादी कारणों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। 2006 में फिलीस्तीन में हुए चुनाव में जनता ने हमास के आतंकी इतिहास को नकार कर चुना ताकि उन्हें भ्रष्ट और अव्यवस्थित शासन से छुटकारा मिल सके। बंग्लादेशी जनता भी हो सकता है ऐसा करने को तैयार हो, और अगर ऐसा न भी हो तो भी अलकायदा की बंग्लादेशियों के साथ नजदीकियां और चुनाव की हाल में होने की संभावना न होने से यह बात तय है कि आतंकवादी अपने हिसाब से जनता के प्रतिनिधि चुनेंगे। इस्लामवादी आतंकियों के बम धमाके ने 2005 में पूरे देश को अपने लपेटे में ले लिया था।
वामपंथियों ने वर्ष 2006 में बड़े पैमाने पर श्रमिक आंदोलनों को हवा दी। मई में हुई हिंसा जिसमें 100 से ज्यादा लोग हताहत हुए, के बाद सरकार ने मजबूर होकर अर्धसैनिक बल बांग्लादेश राइफल्स को तैनात किया। इस्लामवादियों ने काफी दिनों से बंग्लादेश को अपने कब्जे में लेने के लिए वातावरण तैयार किया था। इस्लामवादी नेपाल को अपने भूतपूर्व वामपंथी साथियों के जिम्मे छोड़ने को तैयार हैं, जिसपर भारतीय खुफिया एजेंसियों को शक है कि वो उत्तरपूर्वी भारत के वामपंथियों के साथ गठजोड़ बना सकते हैं।