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Thu, 24 Jul 2008 14:05:00

उनके देश की सीमाएं

अब यह निश्चित हो गया है कि अमरीका के साथ परमाणु समझौता होकर रहेगा। आगामी चुनाव भी अब २००९ में होंगे, इसमें कुछ संदेह नहीं
मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी

अंतत: कांग्रेस ने संसद में विश्वास मत पा ही लिया। २५६ के मुकाबले २७५ मत पाकर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने सिद्ध कर दिया कि जनता भले ही न हो; पर अधिकांश सांसद उनके साथ हैं। इस प्रकार गत दो साल से चल रही बहस और एक महीने से चल रही उठापटक का पटाक्षेप हो गया। अब यह निश्चित हो गया है कि अमरीका के साथ परमाणु समझौता होकर रहेगा। आगामी चुनाव भी अब २००९ में होंगे, इसमें कुछ संदेह नहीं।

इस दौरान देश भर में जो विचार-विमर्श और चिंतन-मंथन हुआ, वह बहुत महत्वपूर्ण है। यह बात सिद्ध हो गयी कि अधिकांश सांसदों को परमाणु समझौते की वास्तविकता बहुत कम पता थी। यद्यपि इसे उ०प्र० के एक बाहुबली सांसद अतीक अहमद ने ही खुलकर स्वीकार किया। जो सांसद या दल इस समय सरकार के पक्ष या विपक्ष में गये, उन्होंने अपने हर भाषण में देश हित की बात कही। भाजपा, वामपंथियों, बसपा और अनेक छोटे दलों ने परमाणु समझौते को देशहित के विपरीत बताया, जबकि कांग्रेस, सपा और उनके मित्र दलों ने समझौते को देशहित में कहा। यह बात दूसरी है कि हर किसी की देशहित की परिभाषा भिन्न थी।

इस सारे विमर्श में भाजपा के नेतृत्व वाला राजग अंत तक अपने दृष्टिकोण पर स्थिर रहा। सबसे अधिक छीछालेदर वामपंथियों की हुई। चार साल तक उन्होंने सरकार के साथ रहकर सत्ता की मलाई खाई; पर अंतिम साल में उसे मंझधार में धकेल दिया। इसी प्रकार बसपा गत एक साल से सरकार के साथ थी; पर अब उसने पाला बदल लिया। सबसे प्रमुख भूमिका सपा और इस प्रकरण में हीरो बनकर उभरे अमरसिंह की रही। चार साल पहले जिस व्यक्ति और दल को सोनिया गांधी ने अपनी दावत में अपमानित किया था, वही उनका संकटमोचक बनकर उभरा। जिस मुलायम सिंह ने उ०प्र० के चुनाव में कांग्रेस को जी भर कर गालियां दीं, वही आज उनके बगलगीर हो गये। यह भारतीय राजनीति का विद्रूप है, जिसका तमाशा सारी दुनिया ने देखा। इससे नि:संदेह भारतीय लोकतंत्र की गरिमा धूल धूसरित ही हुई है।

जहां तक हर दल और नेता के देशहित की बात है, तो यह भी साफ हो गया कि उनके मन में देश की सीमा बहुत छोटी है। देश की बात तो वे तब करते, जब उन्हें इस समझौते के बारे में विस्तार से पता होता। हर दल के लिए उनका राज्य, उसमें होने वाले आगामी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव और उसमें हो सकने वाले गठबंधन ही महत्वपूर्ण थे, देश नहीं। इसी प्रकार अनेक नेताओं ने भी सिद्ध कर दिया कि उनके लिए देश का अर्थ उनका संसदीय क्षेत्र है। उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव में कौन सा दल टिकट दे सकता है, उनके जीतने की संभावना किस दल और क्षेत्र से है, यही उनके सामने था, यद्यपि बात वे भी देशहित की ही करते रहे।

यह स्पष्ट है कि उ०प्र० में मुलायम सिंह का संघर्ष बसपा से है, कांग्रेस या भाजपा से नहीं। इसलिए जब बसपा ने केन्द्र से समर्थन वापस लिया, तो सपा को कांग्रेस के साथ जाना ही था। आगामी लोकसभा चुनाव में उ०प्र० एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह कहावत तो बहुप्रचलित है ही कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। मायावती स्वयं प्रधानमंत्री बनने की इच्छुक हैं। इसलिए उस समय उ०प्र० में सपा और बसपा के बीच भयंकर संघर्ष होगा। कांग्रेस सपा के सहयोग से आठ-दस सीट जीतना चाहती है। तब क्या होगा, यह तो भविष्य बताएगा; पर सपा और बसपा के लिए देश का अर्थ उ०प्र० है, यह स्पष्ट हो गया। अजीत सिंह जैसा बेपेंदी का लोटा भारत में मिलना कठिन है। उनके लिए देश का अर्थ पश्चिमी उ०प्र० की १०-१२ सीट हैं। मायावती ने उनके सामने हरित प्रदेश का चारा फंेका, इसलिए वे उनके साथ लग गये।

हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला को सदा कांग्रेस से ही लोहा लेना पड़ता है, इसलिए उनका सरकार के पक्ष में जाने का कोई अर्थ नहीं था। उनका देश हरियाणा तक सीमित है। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू को भी विधानसभा से बाहर का रास्ता कांग्रेस ने ही दिखाया था, इसलिए यदि उन्हें फिर से राज्य में सत्ता पानी है, तो कांग्रेस का पराजित होना जरूरी है। उन्हें लग रहा था कि यदि केन्द्र सरकार गिर गयी, तो इसका राज्य पर भी असर होगा; पर उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पायी। कुछ लोगों के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों से दूरी दिखाना मजबूरी है। उमर अब्दुल्ला, महबूबा आदि इसी श्रेणी के लोग हैं। उन्हें भी आगामी विधानसभा चुनाव की चिंता है, देश की नहीं।

ममता बनर्जी को बंगाल में माकपा से भी लड़ना पड़ता है और कांग्रेस से भी। अब आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और माकपा बंगाल में बहुत वर्षों बाद खुलकर लड़ेंगे। ऐसे में प्रणव मुखर्जी के विरोध के बावजूद कांग्रेस यदि ममता केे नेतृत्व में चुनाव लड़े, तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। ममता ने चुप रहकर कांग्रेस के मन में अपने लिए एक नरम कोना तो बना ही लिया है। अब ऊंट किस करवट बैठेगा, यह भविष्य बतायेगा।

इसी कसौटी पर भाजपा के साथी दलों को कसा जा सकता है। अकाली कभी कांग्रेस के साथ नहीं जा सकते। इसी तरह नितीश भी बिहार में लालू के विरोध में ही रहने वाले हैं। इसलिए इनकी भूमिकाएं पहले दिन से ही निश्चित हो गयी थीं। आश्चर्य है कि तेलंगाना के समर्थक चंद्रशेखर राव और उसके विरोधी चंद्रबाबू नायडू मायावती के साथ कैसे आ गये ? शिबू सोरेन को जो अधिक मलाई दे सके, वे उसके साथ जाने को सदा तत्पर रहते हैं। इस बार कांग्रेस की ओर से यह आश्वासन मिला, सो वे उसके साथ रहे।

पर अब सरकार बचने के बाद क्या होगा, यह देखना भी रोचक रहेगा। इस समझौते में भारत से अधिक अमरीका की रुचि है, इसी से समझा जा सकता है कि यह किसके हित में है ? अमरीका एक व्यापारी देश है, वह अपने हित में जब चाहे, किसी समझौते को तोड़ देता है। पैसे और हथियार की ताकत उसके पास है ही, इसलिए वह कितने दिन तक साथ निभाएगा, कहना कठिन है।

दिल्ली में पर्दे के आगे और पीछे जो खेल हुए हैं, उनका खुलासा अब होगा। अब अमरसिंह अपनी असली कीमत वसूल करेंगें। उन्हें कौन से मंत्रालय मिलेंगे, इस आधार पर हो सकता है, कांग्रेस में सिर फुटव्वल हो। शिबू सोरेन को भी कीमत देनी ही होगी। वामपंथियों में भी फूट पड़ी है। सोमनाथ चटर्जी यों तो प्रकाश करात के पार्टी महासचिव बनने से ही नाराज थे; पर अब त्यागपत्र के नाम पर जो उठापटक हुई, उससे वे खुलकर सामने आ गये हैं। इससे बंगाल के समीकरण भी बदल सकते हैं और देश के भी।

राजग में भी टूट हुई है। जिन १० सांसदों ने दूसरी ओर वोट दिया है, उनमें से सात भाजपाई हैं। यह भाजपा के लिए चिंता का विषय है। लोकसभा चुनाव की दुंदुभी बज ही चुकी है, ऐसे में उसे अनेक नये प्रत्याशी ढूंढने होंगे। उसे यह भी सोचना होगा कि इधर-उधर से जिताऊ प्रत्याशी ढूंढकर चुनाव लड़ाना कितना लाभकारी होता है। विश्वास मत का परिणाम आनेे के बाद आडवाणी जी के चेहरे पर खिंची चिंता की रेखाएं शायद इसी को परिलक्षित कर रही थीं।

कुल मिलाकर विश्वास मत की इस जंग ने सिद्ध कर दिया है कि संसद में बैठने वालों का कद कितना बौना और सोच कितनी सीमित है। ऐसे लोगों के बल पर देश के भविष्य को उज्जवल मानना मूर्खता ही है। इस प्रकरण से विश्व भर में भारत का लोकतंत्र एक बिकाऊ वस्तु बनकर प्रकट हुआ है। इसलिए देश के प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को इस खोखले संविधान और निरर्थक चुनाव प्रणाली को बदलने के लिए कमर कसनी होगी।


 


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cmpershad@yahoo.com chandra Mouleshwer Nuclear deal Thu, 24 Jul 2008 17:47:42 परमाणु करार तो दोनों राष्ट्रीय पार्टियां- भाजपा और कांग्रेस चाहती थी। और यही संसद में साबित हुआ। रही बात खरीद-फ़रोक्त की, तो जब वोटर बिक सकते हैं तो संसद क्यों नहीं?
 


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