भारत आतंकवाद के सबसे बड़े निशाने में से एक है, लेकिन बरसों के इस अनुभव से हमने कोई सबक नहीं लिया। हमारे लिए आतंकवाद महज एक आपराधिक घटना बना हुआ है। ठीक है कि संकट में दहशत से भर जाना, आपाधापी में तकलीफदेह कदम उठाना आतंक को संतुष्ट होने का मौका देता है, लेकिन जब हालात थोड़े सहज हों, तब हम भविष्य के लिए मोर्चाबंदी क्यों नहीं करते? दिल्ली और इस पूरे देश के लोगों ने जो दुख उठाया है, उसे बदकिस्मती कहकर भुलाया नहीं जा सकता।
अब प्रश्न यह उठता है कि आतंकवाद से मुकाबला कैसे करे। कोई भी समाज ,राज्य और देश आतंकवाद से मुकाबला एक स्तर पर नही कर सकता है, इसे कई स्तरो पर करना होगा। पहला अपने पुलिस बल और खुफिया तंत्रो को मजबुत बनाने के साथ ही साथ आतंकवाद से लडने के हथियार भी मुहैया कराना। दूसरा ऐसा जनमानस तैयार करना जो विस्फोट के बाद वैसी प्रतिक्रिया न दे जैसा आतंकवादी चाहते है। तीसरा राजनैतिक स्तर पर समाधान ढुढना। जनमानस स्तर पर समस्या बडी नही है। समस्या राजनैतिक भी नही है इस लिए राजनीतिक समाधान के लिए भी प्रयास करने की जरुरत नही है। आतंकवाद के विरुध रणनीति बनाते वक्त राजनीतिक स्तर पर सर्वसम्मति बनाने की सख्त जरुरत है ताकि जब ऐसी वरदाते हो तो राजनीतिक दल इसे वोट हासिल करने का मौका न बनाये।
अभी वक्त की मांग है कि हम अपने पुलिस और खुफिया व्यवस्था को मजबूत बनाये ताकि आतंकवादियो की जो नई धमकी है कि अब मुम्बई की बारी है उसको रोका जा सके। फिलहाल सरकार इस पर ध्यान दे तो निर्दोष लोगो की जान बचायी जा सकती है और आतंकवादियो का हौसला पस्त किया जा सकता है। वरना ऐसी वारदाते होती रहेगी और लोग मरते रहेंगे और हमारी सरकार देखती रहेगी । कहावत है जो सोया है उसे ही जगाया जा सकता है पर जो सोने का नाटक कर रहा है उसे कैसे जगाया जा सकता है यह सरकार आतंकवाद से लडने का नाटक कर रही है लड नही रही है इस लिए देश आतंकवादियो घर बन गया है, और आतंकवादी जहा चाहते है वहा विस्फोट कर देते है।