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Sat, 10 May 2008 17:03:00

रूस करे तो वाह, भारत तो हाय तौबा

वाम दलों को अमेरिका का 123 समझौता अछूत हो लेकिन रूस के लिए उपयुक्त है। जब प्रणव मुखर्जी वाम दलों से निवेदन कर रहे थे कि समझौता पर आगे बढ़ने की जरूरत है तो वाम दल इस समझौता को हर तरह से रोकने पर अमादा थे। उसी वक्त रूस और अमेरिका 123 समझौता पर हस्ताक्षर कर रहे थे।
123 समझौता

जो संधि के समर्थक है उनके लिए वाम दलो को समझाने के लिए बेहतर विकल्प दिख रहा है,कि रूस ने 1,2,3 को अपना लिया है तो आप क्यों नहीं अपनाते। संधि पर रूस के तरफ से रोस्टम के परमाणु निदेशक सारगेई क्रियानोको और रूस में अमेरिका के राजदूत विलियम वर्न्स ने हस्ताक्षर किये। संधि की वार्त्ता मई 2006 में शुरू हुई ,2007 में इसे सम्पन्न कर लिया गया और मई 2008 में हस्ताक्षर कर लिया। सरकारी सूत्रों के अनुसार वाम दलो के विरोध में कोई तथ्य नहीं है, पर यूपीए चुनाव से डरती है इस लिए समझौता नहीं हो पा रहा है।

प्रधानमंत्री ने आशा व्यक्त की कि समझौता हो जायेगा, प्रधानमंत्री के अनुसार अगली बैठक जो 28 मई को है, उसमें आईएईए समझौते को हरी झंडी मिलने की सम्भावना है। प्रधानमंत्री ने आशा व्यक्त की कि वाम दलो को सदबुद्धि आयेगी। 2 जून को आईएईए की बोर्ड की बैठक होगी उससे पहले सरकार समझौता करने की स्थिति में होगी।

वाम दल ईरान के साथ दोस्ती को यूपीए की विदेश नीति की कसौटी मानते हैं वह अलग बात है कि रूस ईरान के साथ आणविक संबंध बनाये रखते हुए भी अमेरिका से समझौता कर रहा है। यह अलग बात है कि रूस का समझौता और भारत का समझौता अलग-अलग है। क्योंकि रूस ने एनटीपी पर हस्ताक्षर कर रखा है।

नवम्बर 2007 में रूस ने जब हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया था तब वाम दल काफी गुस्से में थे। सही खबर यह है कि रूस ने कहा कि जब तक भारत एनटीपी पर हस्ताक्षर नही करेगा तब तक वह समझौता नही करेगा। फ्रांस के साथ भी यही स्थिति है। रूस और चीन जो भारतीय वाम दलो के प्रेरणा स्रोत है, अमेरिका के साथ परमाणु समझौता करे वह तो ठीक है, पर भारत में वाम दल  सरकार को बंधक बनाये हुए है। यूपीए सरकार क्या वाम दलो के बंधन से मुक्त होकर समझौता करेगी देखने लायक बात होगी।


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