भारत की रक्षा तैयारियों में यह एक खामी थी, जो अब पूरी हो गई है। इससे भारत का सामरिक रुतबा बढ़ेगा, क्योंकि अब यह साफ हो चुका है कि भविष्य में अग्नि-चार के साथ वह अंतर-महाद्वीपीय मिसाइल से लैस होने का मुकाम भी हासिल कर लेगा।
अग्नि-तीन करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर तक मार कर सकती है, यानी हमारे आसपास का एक बड़ा इलाका इसके दायरे में आ जाता है। कहा जाना चाहिए कि भारत की सामरिक क्षमता क्षेत्रीय सीमा से आजाद हो गई है। अग्नि-तीन के मुकाबले में पाकिस्तान के पास जो शाहीन-दो मिसाइल है, उसकी रेंज करीब दो हजार किलोमीटर की है, अलबत्ता चीन के पास अंतर-महाद्वीपीय मिसाइल है, जो ग्यारह हजार किलोमीटर से भी आगे जा सकती है। लेकिन अग्नि की कामयाबी ने जता दिया है कि भारत इस मुकाम से कुछ ही बरस दूर है।
इस संकेत को सारी दुनिया में नोट किया जाएगा, एशिया के सामरिक माहौल पर तो इसका गहरा असर पड़ेगा ही। इस कामयाबी के लिए डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) तारीफ का हकदार है, लेकिन अपने स्वर्ण जयंती वर्ष में उसे इतने से संतोष नहीं कर लेना चाहिए। उसके सामने बहुत सी चुनौतियां हैं। तभी अतीत की बदनामियों से उसका पीछा छूटेगा। डीआरडीओ के पास नाकामियों की एक लंबी लिस्ट है। मुमकिन है कि इन सबके लिए वह दोषी न हो, कई नाकामियां उस पर मढ़ दी जाती हों, लेकिन इस इमेज से छुटकारा पाकर रिसर्च और डिवेलपमेंट की नामी संस्था बनने का इम्तहान उसे ही पास करना है।
हाल के दिनों में जिन विवादों से डीआरडीओ का पाला पड़ा है, वे पेचीदा किस्म के हैं। मसलन मेन बैटल टैंक अर्जुन का मामला लें, जिसे सर्दियों में परीक्षण के दौरान आर्मी ने खराब ठहरा दिया। अर्जुन टैंक को बनते-बनते 34 साल हो गए हैं। यह विवाद अब इतना उलझ गया है कि किसी शर्मनाक ड्रामे की तरह लगता है। रक्षा राज्यमंत्री राव इंदरजीत का कहना है कि सर्दियों वाले परीक्षण में भितरघात हुआ लगता है, जिसकी जांच होगी। इस बीच दो लॉबियों के बीच जो तलवारें खिंची हैं, वे देखने लायक हैं।
डीआरडीओ के पक्षधर कह रहे हैं कि आर्मी जब-तब नए अपग्रेड सुझाती रहती है और मामूली खामियों पर हंगामा खड़ा करती है। इसके बरक्स आर्मी के पक्षधरों का कहना है कि किसी भी खामी से समझौता नहीं किया जा सकता और अर्जुन से एकदम अत्याधुनिक होने की उम्मीद की ही जाएगी। इस तीखी और अक्सर अशोभनीय लगती बहस से यह फैसला कभी नहीं हो सकता कि किस नाकामी के लिए कौन कितना दोषी है।
असल मुद्दा यह है कि सेना के तीनों अंग, डीआरडीओ और प्राइवेट रिसर्च कैसे मिलकर काम करें, ताकि हम रक्षा मामलों में अपने पैरों पर खड़े हो सकें। यह वक्त सहयोग का नया फॉर्म्युला तलाशने का है। अग्नि की कामयाबी से यह अहसास जागना चाहिए।