चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन, जस्टिस आर. वी. रवींद्रन और जस्टिस जे. एम. पांचाल की बेंच ने कहा कि मद्रास हाई कोर्ट एएसआई (भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण) से जांच कराने के लिए पहले ही कह चुका है। बेंच ने यह भी कहा कि सवेर् के पक्ष में याचिका में 'गंभीर तर्क' दिए गए हैं। हाई कोर्ट ने पिछले साल 19 जून को आदेश दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट में 22 जुलाई को सुनवाई होगी। केंद्र के पक्ष में विवादास्पद परियोजना की पैरवी कर रहे प्रसिद्ध वकील फाली एस. नरीमन ने बेंच की टिप्पणी से सहमति जताई। पीठ ने कहा कि सरकार इस बीच विचार करे कि क्या रामसेतु को नुकसान पहुंचाए बगैर परियोजना के लिए कोई और वैकल्पिक मार्ग हो सकता है। कोर्ट ने सरकार से मद्रास हाईकोर्ट के निर्देशों पर भी विचार करने को कहा।
मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या एडमब्रिज [रामसेतु] के बारे में कभी एएसआई या किसी और विभाग ने अध्ययन किया और क्या इस सेतु को राष्ट्रीय स्मारक माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय से इस बाबत हलफनामा दाखिल करने को कहा था। हाईकोर्ट ने यह भी पूछा था कि क्या रामसेतु को नुकसान पहुंचाए बगैर कोई और वैकल्पिक मार्ग हो सकता है। यह मामला हाईकोर्ट से स्थानांतरित होकर सुप्रीमकोर्ट आ गया है। याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील यही है कि सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देशों के मुताबिक रामसेतु के लिए एएसआई सर्वे नहीं कराया है और एएसआई जांच के बगैर यह सिद्ध नहीं हो सकता कि यह मानव निर्मित है या नहीं या फिर कितना प्राचीन है। याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग रामसेतु के बारे में एएसआई अध्ययन कराने और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किए जाने की है। इसके पहले मामले में बहस करते हुए जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी ने सेतुसमुद्रम परियोजना से होने वाले आर्थिक लाभ को सरकार की गलत गणना कहा।
जनता पार्टी के नेता सुब्रह्माण्यम स्वामी ने याचिका में कहा था कि अन्य उपायों से भी परियोजना पर काम हो सकता है और इस पर खर्चा भी ज्यादा नहीं आएगा।