शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने मांग की कि गंगा को राष्ट्रीय प्रतीक अधिनियम के तहत राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाए।
पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि गंगा के तटों पर हमारी सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ है। भारत की भाग्य रेखा कही जाने वाली इस नदी के तटों पर रहने वाले करीब 35 करोड़ लोग पूरी तरह से गंगा पर निर्भर है। लेकिन कथित विकास के नाम पर गंगा के उद्गम स्थल से लेकर उसके पूरे बहाव क्षेत्र में जो बदलाव किए गए है, उन्होंने इसके अस्तित्व पर ही सवाल लगा दिया है। अगर फौरन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो गंगा की स्थिति क्षेत्रीय नदियों से भी बदतर हो जाएगी।
गंगा और उसकी सहायक नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए 'राष्ट्रीय गंगा पर्यावरण आयोग' गठित किया जाए। साथ ही शहरों की गंदगी और औद्योगिक कचरे को गंगा में मिलने से रोकने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास किए जाएं। उन्होंने मांग की कि सरकार गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करे कि गोमुख से गंगा सागर तक वह बेरोकटोक बहे। इसके अलावा गंगा में मिलने वाली सभी नदियों को भी पवित्र गंगा मानते हुए उनके नैसर्गिक प्रवाह को भी सुनिश्चित किया जाए। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के साथ राजस्थान में जलक्रांति करने वाले राजेंद्र सिंह व दूसरे कार्यकर्ता भी मौजूद थे।